भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 347
  • अयोध्याकाण्ड *

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सबके हृदयमें ऐसी अभिलाषा है और सब महादेवजीको मनाकर (प्रार्थना करके) कहते हैं कि राजा अपने जीते-जी श्रीरामचन्द्रजीको युवराजपद दे दें ॥ १ ॥

एक समय सब सहित समाजा । राजसभाँ रघुराजु बिराजा ॥ सकल सुकृत मूर्ति नरनाहू । राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू ॥

एक समय रघुकुलके राजा दशरथजी अपने सारे समाजसहित राजसभामें विराजमान थे। महाराज समस्त पुण्योंकी मूर्ति हैं, उन्हें श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनकर अत्यन्त आनन्द हो रहा है ॥ १ ॥

नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें । लोकप करहिं प्रीति रुख राखें ॥ तिभुवन तीनि काल जग माहीं । भूरिभाग दसरथ सम नाहीं ॥

सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपालगण उनके रुखको रखते हुए (अनुकूल होकर) प्रीति करते हैं। [पृथ्वी, आकाश, पाताल] तीनों भुवनोंमें और [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालोंमें दशरथजीके समान बड़भागी [और] कोई नहीं है ॥ २ ॥

मंगलमूल रामु सुत जासू । जो कछु कहिअ थोर सबु तासू ॥ रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा । बदनु बिलोकि मुकुटु सम कीन्हा ॥

मङ्गलोकके मूल श्रीरामचन्द्रजी जिनके पुत्र हैं, उनके लिये जो कुछ कहा जाय सब थोड़ा है। राजाने स्वाभाविक ही हाथमें दर्पण ले लिया और उसमें अपना मुँह देखकर मुकुटको सीधा किया ॥ ३ ॥

श्रवन समीप भए सित केसा । मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा ॥ नृप जुबराजु राम कहुँ देहू । जीवन जनम लाहु किन लेहू ॥

[देखा कि] कानोंके पास बाल सफेद हो गये हैं, मानो बुढ़ापा ऐसा उपदेश कर रहा है कि हे राजन्! श्रीरामचन्द्रजीको युवराज-पद देकर अपने जीवन और जन्मका लाभ क्यों नहीं लेते ॥ ४ ॥

दो०— यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ ।

प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ ॥ २ ॥

हृदयमें यह विचार लाकर (युवराज-पद देनेका निश्चय कर) राजा दशरथजीने शुभ दिन और सुन्दर समय पाकर, प्रेमसे पुलकितशरीर हो आनन्दमग्न मनसे उसे गुरु वसिष्ठजीको जा सुनाया ॥ २ ॥

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक । भए राम सब बिधि सब लायक ॥ सेवक सचिव सकल पुरबासी । जे हमारे अरि मित्र उदासी ॥

राजाने कहा—हे मुनिराज! [कृपया यह निवेदन] सुनिये। श्रीरामचन्द्र अब सब प्रकारसे सब योग्य हो गये हैं। सेवक, मन्त्री, सब नगरनिवासी और जो हमारे शत्रु, मित्र या उदासीन हैं— ॥ १ ॥