भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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  • रामचरितमानस *

सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही । प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही ॥ बिप्र सहित परिवार गोसाईं । करहिं छोहु सब रौरिहि नाईं ॥

सभीको श्रीरामचन्द्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं । [उनके रूपमें] आपका आशीर्वाद ही मानो शरीर धारण करके शोभित हो रहा है। हे स्वामी! सारे ब्राह्मण, परिवारसहित आपके ही समान उनपर स्नेह करते हैं ॥ २ ॥

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं । ते जनु सकल बिभव बस करहीं ॥ मोहि सम यह अनुभयउ न दूजें । सबु पायउँ रज पावनि पूजें ॥

जो लोग गुरुके चरणोंकी रजको मस्तकपर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्यको अपने वशमें कर लेते हैं। इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसीने नहीं किया। आपकी पवित्र चरण-रजकी पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया ॥ ३ ॥

अब अभिलाषु एकु मन मोरें । पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें ॥ मुनि प्रसन्न लिखि सहज सनेहू । कहेउ नरेस रजायसु देहू ॥

अब मेरे मनमें एक ही अभिलाषा है। हे नाथ! वह भी आपहीके अनुग्रहसे पूरी होगी। राजाका सहज प्रेम देखकर मुनिने प्रसन्न होकर कहा—नरेस! आज्ञा दीजिये (कहिये, क्या अभिलाषा है?) ॥ ४ ॥

दो०—राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।

फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार ॥ ३ ॥

हे राजन्! आपका नाम और यश ही सम्पूर्ण मनचाही वस्तुओंको देनेवाला है। हे राजाओंके मुकुटमणि! आपके मनकी अभिलाषा फलका अनुगमन करती है (अर्थात् आपके इच्छा करनेके पहले ही फल उत्पन्न हो जाता है) ॥ ३ ॥

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी । बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी ॥ नाथ रामु करिअहिं जुबराजू । कहिअ कृपा करि करिअ समाजू ॥

अपने जीमें गुरुजीको सब प्रकारसे प्रसन्न जानकर, हर्षित होकर राजा कोमल वाणीसे बोले—हे नाथ! श्रीरामचन्द्रको युवराज कीजिये। कृपा करके कहिये (आज्ञा दीजिये) तो तैयारी की जाय ॥ १ ॥

मोहि अछत यहु होइ उछाहू । लहहिं लोग सब लोचन लाहू ॥ प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं । यह लालसा एक मन माहीं ॥

मेरे जीते—जी यह आनन्द-उत्सव हो जाय, [जिससे] सब लोग अपने नेत्रोंका लाभ प्राप्त करें। प्रभु (आप)-के प्रसादसे शिवजीने सब कुछ निबाह दिया (सब इच्छाएँ पूर्ण कर दीं), केवल यही एक लालसा मनमें रह गयी है ॥ २ ॥