श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ । जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ ॥ सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए । मंगल मोद मूल मन भाए ॥
[इस लालसाके पूर्ण हो जानेपर] फिर सोच नहीं, शरीर रहे या चला जाय, जिससे मुझे पीछे पछतावा न हो। दशरथजीके मङ्गल और आनन्दके मूल सुन्दर बचन सुनकर मुनि मनमें बहुत प्रसन्न हुए ॥ ३ ॥
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं । जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं ॥ भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी । रामु पुनीत प्रेम अनुगामी ॥
[वसिष्ठजीने कहा—] हे राजन्! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना जीकी जलन नहीं जाती, वही स्वामी (सर्वलोकमहेश्वर) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेमके अनुगामी हैं। [श्रीरामजी पवित्र प्रेमके पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, इसीसे तो प्रेमवश आपके पुत्र हुए हैं] ॥ ४ ॥
दो०—बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु ॥ ४ ॥
हे राजन्! अब देर न कीजिये; शीघ्र सब सामान सजाइये। शुभ दिन और सुन्दर मङ्गल तभी है जब श्रीरामचन्द्रजी युवराज हो जायें (अर्थात् उनके अभिषेकके लिये सभी दिन शुभ और मङ्गलमय हैं) ॥ ४ ॥
मुदित महीपति मंदिर आए । सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए ॥ कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए । भूप सुमंगल बचन सुनाए ॥
राजा आनन्दित होकर महलमें आये और उन्होंने सेवकोंको तथा मन्त्री सुमन्त्रको बुलवाया। उन लोगोंने 'जय-जीव' कहकर सिर नवाये। तब राजाने सुन्दर मङ्गलमय बचन (श्रीरामजीको युवराज-पद देनेका प्रस्ताव) सुनाये ॥ १ ॥
जौं पाँचहि मत लागै नीका । करहु हरषि हियँ रामहि टीका ॥
[और कहा—] यदि पंचोंको (आप सबको) यह मत अच्छा लगे, तो हृदयमें हर्षित होकर आपलोग श्रीरामचन्द्रका राजतिलक कीजिये ॥ २ ॥
मन्त्री मुदित सुनत प्रिय बानी । अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी ॥ बिनती सचिव करहिं कर जोरी । जिअहु जगतपति बरिस करोरी ॥
इस प्रिय वाणीको सुनते ही मन्त्री ऐसे आनन्दित हुए मानो उनके मनोरथरूपी पौधपर पानी पड़ गया हो। मन्त्री हाथ जोड़कर बिनती करते हैं कि हे जगत्पति! आप करोड़ों वर्ष जियें ॥ ३ ॥