श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८
- रामचरितमानस *
जग मंगल भल काजु बिचारा । बेगिअ नाथ न लाइअ बारा ॥ नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा । बढत बौड़ जनु लही सुसाखा ॥
आपने जगत्भरका मङ्गल करनेवाला भला काम सोचा है। हे नाथ! शीघ्रता कीजिये, देर न लगाइये। मन्त्रियोंकी सुन्दर वाणी सुनकर राजाको ऐसा आनन्द हुआ मानो बढ़ती हुई बेल सुन्दर डालीका सहारा पा गयी हो ॥४॥
दो०—कहेउ भूप मुनिराज कर जोड़ जोड़ आयसु होइ।
राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोड़ सोड़ ॥५॥
राजाने कहा—श्रीरामचन्द्रके राज्याभिषेकके लिये मुनिराज वसिष्ठजीकी जो-जो आज्ञा हो, आपलोग वही सब तुरंत करें ॥५॥
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी ॥ औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना ॥
मुनिराजने हर्षित होकर कोमल वाणीसे कहा कि सम्पूर्ण श्रेष्ठ तीर्थोंका जल ले आओ। फिर उन्होंने औषधि, मूल, फूल, फल और पत्र आदि अनेकों माङ्गलिक वस्तुओंके नाम गिनकर बताये ॥१॥
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती ॥ मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका ॥
चँवर, मृगचर्म, बहुत प्रकारके वस्त्र, असंख्यों जातियोंके ऊनी और रेशमी कपड़े, [नाना प्रकारकी] मणियों (रत्न) तथा और भी बहुत-सी मङ्गल वस्तुएँ, जो जगत्में राज्याभिषेकके योग्य होती हैं [सबको मँगानेकी उन्होंने आज्ञा दी] ॥२॥
बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना ॥ सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा ॥
मुनिने वेदोंमें कहा हुआ सब विधान बताकर कहा—नगरमें बहुत-से मण्डप (चँदोवे) सजाओ। फलोंसमेत आम, सुपारी और केलेके वृक्ष नगरकी गलियोंमें चारों ओर रोप दो ॥३॥
रचहु मंजु मनि चौकें चारु। कहहु बनावन बेगि बजारु ॥ पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा ॥
सुन्दर मणियोंके मनोहर चौक पुरवाओ और बाजारको तुरंत सजानेके लिये कह दो। श्रीगणेशजी, गुरु और कुलदेवताकी पूजा करो और भूदेव ब्राह्मणोंकी सब प्रकारसे सेवा करो ॥४॥
दो०—ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।
सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग ॥६॥