श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
सबसे पहले [रनिवासमें] जाकर जिन्होंने ये वचन (समाचार) सुनाये, उन्होंने बहुत-से आभूषण और वस्त्र पाये। रानियोंका शरीर प्रेमसे पुलकित हो उठा और मन प्रेममें मग्न हो गया। वे सब मङ्गलकलश सजाने लगीं ॥ १ ॥
चौकें चारु सुमित्राँ पूरी । मनिमय बिबिध भाँति अति रूरी ॥ आनँद मगन राम महतारी । दिए दान बहु बिप्र हँकारी ॥
सुमित्राजीने मणियों (रत्नों)-के बहुत प्रकारके अत्यन्त सुन्दर और मनोहर चौक पूरे। आनन्दमें मग्न हुई श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने ब्राह्मणोंको बुलाकर बहुत दान दिये ॥ २ ॥
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा । कहेउ बहोरि देन बलिभागा ॥ जेहि बिधि होइ राम कल्यानू । देहु दया करि सो बरदानू ॥
उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागोंकी पूजा की और फिर बलि भेंट देनेको कहा (अर्थात् कार्य सिद्ध होनेपर फिर पूजा करनेकी मनौती मानी); और प्रार्थना की कि जिस प्रकारसे श्रीरामचन्द्रजीका कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिये ॥ ३ ॥
गावहि मंगल कोकिलबयनीं । बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं ॥
कोयलकी-सी मीठी वाणीवाली, चन्द्रमाके समान मुखवाली और हिरनके बच्चेके-से नेत्रोंवाली स्त्रियाँ मङ्गलगान करने लगीं ॥ ४ ॥
दो०—राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि ॥ ८ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक सुनकर सभी स्त्री-पुरुष हृदयमें हर्षित हो उठे और विधाताको अपने अनुकूल समझकर सब सुन्दर मङ्गल-साज सजाने लगे ॥ ८ ॥
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए । रामधाम सिख देन पठाए ॥ गुर आगमनु सुनत रघुनाथा । द्वार आइ पद नायउ माथा ॥
तब राजाने वसिष्ठजीको बुलाया और शिक्षा (समयोचित उपदेश) देनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीके महलमें भेजा। गुरुका आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजीने दरवाजेपर आकर उनके चरणोंमें मस्तक नवाया ॥ १ ॥
सादर अरघ देइ घर आने । सोरह भाँति पूजि सनमाने ॥ गहे चरन सिय सहित बहोरी । बोले रामु कमल कर जोरी ॥
आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घरमें लाये और षोडशोपचारसे पूजा करके उनका सम्मान किया। फिर सीताजीसहित उनके चरण स्पर्श किये और कमलके समान दोनों हाथोंको जोड़कर श्रीरामजी बोले—