भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 353
  • अयोध्याकाण्ड *

३५१

सेवक सदन स्वामि आगमनू । मंगल मूल अमंगल दमनू॥ तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती । पठइअ काज नाथ असि नीती॥

यद्यपि सेवकके घर स्वामीका पधारना मङ्गलोंका मूल और अमङ्गलोंका नाश करनेवाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दासको ही कार्यके लिये बुला भेजते; ऐसी ही नीति है ॥ ३ ॥

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू । भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥ आयसु होइ सो करौं गोसाईं । सेवकु लहइ स्वामि सेवकाई॥

परन्तु प्रभु (आप)-ने प्रभुता छोड़कर (स्वयं यहाँ पधारकर) जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया। हे गोसाईं! [अब] जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ। स्वामीकी सेवामें ही सेवकका लाभ है ॥ ४ ॥

दो०—मुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस ।

राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस ॥ १ ॥

[श्रीरामचन्द्रजीके] प्रेममें सने हुए वचनोंको सुनकर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीकी प्रशंसा करते हुए कहा कि हे राम! भला, आप ऐसा क्यों न कहें। आप सूर्यवंशके भूषण जो हैं ॥ १ ॥

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ । बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ॥ भूप सजेउ अभिषेक समाजू । चाहत देन तुम्हहि जुबराजू॥

श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका बखान कर, मुनिराज प्रेमसे पुलकित होकर बोले—[हे रामचन्द्रजी!] राजा (दशरथजी)-ने राज्याभिषेककी तैयारी की है। वे आपको युवराज-पद देना चाहते हैं ॥ १ ॥

राम करहु सब संजम आजू । जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥ गुरु सिख देइ राय पहिं गयऊ । राम हृदयै अस बिसमउ भयऊ॥

[इसलिये] हे रामजी! आज आप [उपवास, हवन आदि विधिपूर्वक] सब संयम कीजिये, जिससे विधाता कुशलपूर्वक इस कामको निबाह दें (सफल कर दें)। गुरुजी शिक्षा देकर राजा दशरथजीके पास चले गये। श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें [यह सुनकर] इस बातका खेद हुआ कि— ॥ २ ॥

जनमे एक संग सब भाई । भोजन सयन केलि लरिकाई॥ करनबेध उपबीत बिआहा । संग संग सब भाए उछाहा॥

हम सब भाई एक ही साथ जन्मे; खाना, सोना, लड़कपनके खेल-कूद, कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ-साथ ही हुए ॥ ३ ॥