भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 354

३५२

  • रामचरितमानस *

बिमल बंस यह अनुचित एकू । बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू ॥ प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई । हरउ भगत मन कै कुटिलाई ॥

पर इस निर्मल वंशमें यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयोंको छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़ेका ही (मेरा ही) होता है। [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका यह सुन्दर प्रेमपूर्ण पछतावा भक्तोंके मनकी कुटिलताको हरण करे ॥ ४ ॥

दो०—तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद । सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद ॥ १० ॥

उसी समय प्रेम और आनन्दमें मग्न लक्ष्मणजी आये। रघुकुलरूपी कुमुदके खिलावेवाले चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया ॥ १० ॥

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना । पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना ॥ भरत आगमनु सकल मनावहिं । आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं ॥

बहुत प्रकारके बाजे बज रहे हैं। नगरके अतिशय आनन्दका वर्णन नहीं हो सकता। सब लोग भरतजीका आगमन मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और [राज्याभिषेकका उत्सव देखकर] नेत्रोंका फल प्राप्त करें ॥ १ ॥

हाट बाट घर गलीं अथाई । कहहिं परसपर लोग लोगाई ॥ कालि लगन भलि केतिक बारा । पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा ॥

बाजार, रास्ते, घर, गली और चबूतरोंपर (जहाँ-तहाँ) पुरुष और स्त्री आपसमें यही कहते हैं कि कल वह शुभ लगन (मुहुर्त) कितने समय है जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे ॥ २ ॥

कनक सिंधासन सीय समेता । बैठहिं रामु होइ चित चेता ॥ सकल कहहिं कब होइहि काली । बिघन मनावहिं देव कुचाली ॥

जब सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजी सुवर्णके सिंहासनपर विराजेंगे और हमारा मनचीता होगा (मनःकामना पूरी होगी)। इधर तो सब यह कह रहे हैं कि कल कब होगा, उधर कुचक्री देवता विघ्न मना रहे हैं ॥ ३ ॥

तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा । चोरहि चंदिनि राति न भावा ॥ सारद बोलि बिनय सुर करहीं । बारहिं बार पाय लै परहीं ॥

उन्हें (देवताओंको) अवधके बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोरको चाँदनी रात नहीं भाती। सरस्वतीजीको बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार-बार उनके पैरोंको पकड़कर उनपर गिरते हैं ॥ ४ ॥