भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 355
  • अयोध्याकाण्ड *

३५३

दो०—बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।

रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु ॥ ११ ॥

[वे कहते हैं—] हे माता! हमारी बड़ी विपत्तिको देखकर आज वही कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी राज्य त्यागकर वनको चले जायें और देवताओंका सब कार्य सिद्ध हो ॥ ११ ॥

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती । भइउँ सरोज बिपिन हिमराती ॥ देखि देव पुनि कहहिं निहोरी । मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी ॥

देवताओंकी विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी-खड़ी पछता रही हैं कि [हाय!] मैं कमलवनके लिये हेमन्त-ऋतुकी रात हुई। उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे— हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा ॥ १ ॥

बिसमय हरष रहित रघुराऊ । तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ ॥ जीव करम बस सुख दुख भागी । जाइअ अवध देवहित लागी ॥

श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्षसे रहित हैं। आप तो श्रीरामजीके सब प्रभावको जानती ही हैं। जीव अपने कर्मवश ही सुख-दुःखका भागी होता है। अतएव देवताओंके हितके लिये आप अयोध्या जाइये ॥ २ ॥

बार बार गहि चरन सँकोची । चली बिचारि बिबुध मति पोची ॥ ऊँच निवासु नीचि करतूती । देखि न सकहिं पराइ बिभूती ॥

बार-बार चरण पकड़कर देवताओंने सरस्वतीको संकोचमें डाल दिया। तब वह यह विचारकर चली कि देवताओंकी बुद्धि ओछी है। इनका निवास तो ऊँचा है, पर इनकी करनी नीची है। ये दूसरेका ऐश्वर्य नहीं देख सकते ॥ ३ ॥

आगिल काजु बिचारि बहोरी । करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी ॥ हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई । जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई ॥

परंतु आगेके कामका विचार करके (श्रीरामजीके वन जानेसे राक्षसोंका वध होगा, जिससे सारा जगत् सुखी हो जायगा) चतुर कवि [श्रीरामजीके वनवासके चरित्रोंका वर्णन करनेके लिये] मेरी चाह (कामना) करेंगे। ऐसा विचारकर सरस्वती हृदयमें हर्षित होकर दशरथजीकी पुरी अयोध्यामें आयीं, मानो दुःसह दुःख देनेवाली कोई ग्रहदशा आयी हो ॥ ४ ॥

दो०—नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकड़ केरि।

अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि ॥ १२ ॥

मन्थरा नामकी कैकेयीकी एक मन्दबुद्धि दासी थी, उसे अपयशकी पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धिको फेरकर चली गयीं ॥ १२ ॥