श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 356, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
दीख मंथरा नगर बनावा । मंजुल मंगल बाज बधावा ॥ पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू । राम तिलकु सुनि भा उर दाहू ॥
मन्थराने देखा कि नगर सजाया हुआ है। सुन्दर मङ्गलमय बधावे बज रहे हैं। उसने लोगोंसे पूछा कि कैसा उत्सव है ? [उनसे] श्रीरामचन्द्रजीके राजतिलककी बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा ॥ १ ॥
करइ विचार कुबुद्धि कुजाती । होइ अकाजु कवनि बिधि राती ॥ देखि लागि मधु कुटिल किराती । जिमि गवँ तकड़ लेउँ केहि भाँती ॥
वह दुर्बुद्धि नीच जातिवाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकारसे यह काम रात-ही-रातमें बिगड़ जाय, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहदका छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरहसे उखाड़ लूँ ॥ २ ॥
भरत मातु पहिं गड़ बिलखानी । का अनमनि हसि कह हँसि रानी ॥ ऊतरु देइ न लेइ उसासू । नारि चरित करि ढारइ आँसू ॥
वह उदास होकर भरतजीकी माता कैकेयीके पास गयी। रानी कैकेयीने हँसकर कहा—तू उदास क्यों है ? मन्थरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी साँस ले रही है और त्रियाचरित्र करके आँसू ढरका रही है ॥ ३ ॥
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें । दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें ॥ तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि । छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि ॥
रानी हँसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं (तू बहुत बढ़-बढ़कर बोलनेवाली है)। मेरा मन कहता है कि लक्ष्मणने तुझे कुछ सीख दी है (दण्ड दिया है)। तब भी वह महापापिनी दासी कुछ भी नहीं बोलती। ऐसी लंबी साँस छोड़ रही है, मानो काली नागिन [फुफकार छोड़ रही] हो ॥ ४ ॥
दो०— सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु ।
लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु ॥ १३ ॥
तब रानीने डरकर कहा—अरी! कहती क्यों नहीं ? श्रीरामचन्द्र, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कुशलसे तो हैं ? यह सुनकर कुबरी मन्थराके हृदयमें बड़ी ही पीड़ा हुई ॥ १३ ॥
कत सिख देइ हमहि कोउ माई । गालु करब केहि कर बलु पाई ॥ रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू । जेहि जनेसु देइ जुबराजू ॥