भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • रामचरितमानस *

बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है। यह सूर्यवंशकी सुहावनी रीति ही है। यदि सचमुच कल ही श्रीरामका तिलक है, तो हे सखी! तेरे मनको अच्छी लगे वही वस्तु माँग ले, मैं दूँगी ॥ २ ॥

कौसल्या सम सब महतारी । रामहि सहज सुभायँ पिआरी ॥ मो पर करहिं सनेहु बिसेषी । मैं करि प्रीति परीछा देखी ॥

रामको सहज स्वभावसे सब माताएँ कौसल्याके समान ही प्यारी हैं। मुझपर तो वे विशेष प्रेम करते हैं। मैंने उनकी प्रीतिकी परीक्षा करके देख ली है ॥ ३ ॥

जौं बिधि जनमु देड़ करि छोहू । होहुँ राम सिय पूत पुतोहू ॥ प्राण तें अधिक रामु प्रिय मोरें । तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें ॥

जो विधाता कृपा करके जन्म दें तो [यह भी दें कि] श्रीरामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों। श्रीराम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। उनके तिलकसे (उनके तिलककी बात सुनकर) तुझे क्षोभ कैसा? ॥ ४ ॥

दो० — भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ ।

हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ ॥ १५ ॥

तुझे भरतकी सौगन्ध है, छल-कपट छोड़कर सच-सच कह। तू हर्षके समय विषाद कर रही है, मुझे इसका कारण सुना ॥ १५ ॥

एकहिं बार आस सब पूजी । अब कछु कहब जीभ करि दूजी ॥ फोरि जोगु कपारु अभागा । भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा ॥

[मन्थराने कहा—] सारी आशाएँ तो एक ही बार कहनेमें पूरी हो गयीं। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही योग्य है, जो अच्छी बात कहनेपर भी आपको दुःख होता है ॥ १ ॥

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई । ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई ॥ हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती । नाहिं त मौन रहब दिनु राती ॥

जो झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई! वे ही तुम्हें प्रिय हैं और मैं कड़वी लगती हूँ! अब मैं भी ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कहा करूँगी। नहीं तो दिन-रात चुप रहूँगी ॥ २ ॥

करि कुरुप बिधि परबस कीन्हा । बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा ॥ कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥