श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरेको क्या दोष] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ। कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! (अर्थात् रानी तो होनेसे रही) ॥ ३ ॥
जारे जोगु सुभाउ हमारा । अनभल देखि न जाइ तुम्हारा ॥ तातें कछुक बात अनुसारि । छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी ॥
हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो ॥ ४ ॥
दो०—गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।
सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि ॥ १६ ॥
आधाररहित (अस्थिर) बुद्धिकी स्त्री और देवताओंकी मायाके वशमें होनेके कारण रहस्ययुक्त कपटभरे प्रिय वचनोंको सुनकर रानी कैकेयीने बैरिन् मन्थराको अपनी सुहृद (अहैतुक हित करनेवाली) जानकर उसका विश्वास कर लिया ॥ १६ ॥
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही । सबरी गान मूगी जनु मोही ॥ तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी । रहसी चेरि घात जनु फाबी ॥
बार-बार रानी उससे आदरके साथ पूछ रही हैं, मानो भीलनीके गानसे हिरनी मोहित हो गयी हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गयी। दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई ॥ १ ॥
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ । धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ ॥ सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली । अवध साढ़साती तब बोली ॥
तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ। क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरहसे गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्याकी साढ़साती (शनिकी साढ़े सात वर्षकी दशरूपी मन्थरा) बोली— ॥ २ ॥
प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी । रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी ॥ रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिं पिरिते ॥
हे रानी! तुमने जो कहा कि मुझे सीता-राम प्रिय हैं और रामको तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है। परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गये। समय फिर जानेपर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं ॥ ३ ॥
भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ सोइ छारा ॥ जरि तुम्हारि चह सवति उखारी । रूँधहु करि उपाउ बर बारी ॥