श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
सूर्य कमलके कुलका पालन करनेवाला है, पर बिना जलके वही सूर्य उनको (कमलोंको) जलाकर भस्म कर देता है। सौत कौसल्या तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है। अतः उपायरूपी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) लगाकर उसे रूँध दो (सुरक्षित कर दो) ॥ ४ ॥
दो०—तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।
मन मलीन मुह मीठ नृपु राउर सरल सुभाउ ॥ १७ ॥
तुमको अपने सुहागके [झूठे] बलपर कुछ भी सोच नहीं है; राजाको अपने वशमें जानती हो। किन्तु राजा मनके मैले और मुँहके मीठे हैं ! और आपका सीधा स्वभाव है (आप कपट-चतुराई जानती ही नहीं) ॥ १७ ॥
चतुर गँभीर राम महतारी । बीचु पाइ निज बात सँवारी ॥ पठए भरतु भूप ननिअउरें । राम मातु मत जानब रउरें ॥
रामकी माता (कौसल्या) बड़ी चतुर और गम्भीर है (उसकी थाह कोई नहीं पाता)। उसने मौका पाकर अपनी बात बना ली। राजाने जो भरतको ननिहाल भेज दिया, उसमें आप बस रामकी माताकी ही सलाह समझिये ! ॥ १ ॥
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें । गरबित भरत मातु बल पी कें ॥ सालु तुम्हार कौसलिहि माई । कपट चतुर नहिं होइ जनाई ॥
[कौसल्या समझती है कि] और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरतकी माँ पतिके बलपर गर्वित रहती है ! इसीसे हे माई ! कौसल्याको तुम बहुत ही साल (खटक) रही हो। किन्तु वह कपट करनेमें चतुर है; अतः उसके हृदयका भाव जाननेमें नहीं आता (वह उसे चतुरतासे छिपाये रखती है) ॥ २ ॥
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी । सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी ॥ रचि प्रपंचु भूपहि अपनाई । राम तिलक हित लगन धराई ॥
राजाका तुमपर विशेष प्रेम है। कौसल्या सौतके स्वभावसे उसे देख नहीं सकती। इसीलिये उसने जाल रचकर राजाको अपने वशमें करके [भरतकी अनुपस्थितिमें] रामके राजतिलकके लिये लग्न निश्चय करा लिया ॥ ३ ॥
यह कुल उचित राम कहुँ टीका । सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका ॥ आगिलि बात समुझि डरु मोही । देउ दैउ फिरि सो फलु ओही ॥
रामको तिलक हो, यह रघुकुलके उचित ही है और यह बात सभीको सुहाती है; और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है। परन्तु मुझे तो आगेकी बात विचारकर डर लगता है। दैव उलटकर इसका फल उसी (कौसल्या) को दे ॥ ४ ॥