भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 361
  • अयोध्याकाण्ड *

३५९

दो०— रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हैसि कपट प्रबोधु ।

कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु ॥ १८ ॥

इस तरह करोड़ों कुटिलपनकी बातें गढ़-छोलकर मन्थराने कैकेयीको उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतोंकी कहानियाँ इस प्रकार [बना-बनाकर] कहीं जिस प्रकार विरोध बढे ॥ १८ ॥

भावी बस प्रतीति उर आई । पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई ॥

का पूँछहु तुम्ह अबहूँ न जाना । निज हित अनहित पसु पहिचाना ॥

होनहारवश कैकेयीके मनमें विश्वास हो गया । रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी । [मन्थरा बोली—] क्या पूछती हो ? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा ? अपने भले-बुरेको (अथवा मित्र-शत्रुको) तो पशु भी पहचान लेते हैं ॥ १ ॥

भयउ पाखु दिन सजत समाजू । तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू ॥

खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें । सत्य कहें नहिं दोषु हमारें ॥

पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पायी है आज मुझसे ! मैं तुम्हारे राजमें खाती-पहनती हूँ, इसलिये सच कहनेमें मुझे कोई दोष नहीं है ॥ २ ॥

जों असत्य कछु कहब बनाई । तौ बिधि देइहि हमहि सजाई ॥

रामहि तिलक कालि जों भयऊ । तुम्ह कहूँ बिपति बीजु बिधि बयऊ ॥

यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊँगी तो विधाता मुझे दण्ड देगा । यदि कल रामको राजतिलक हो गया तो [समझ रखना कि] तुम्हारे लिये विधाताने विपत्तिका बीज बो दिया ॥ ३ ॥

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी । भामिनि भइहु दूध कइ मारखी ॥

जों सुत सहित करहु सेवकाई । तौ घर रहहु न आन उपाई ॥

मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूँ, हे भामिनी ! तुम तो अब दूधकी मक्खी हो गयीं ! (जैसे दूधमें पड़ी हुई मक्खीको लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घरसे निकाल बाहर करेंगे) जो पुत्रसहित [कौसल्याकी] चाकरी बजाओगी तो घरमें रह सकोगी ; [अन्यथा घरमें रहनेका] दूसरा उपाय नहीं ॥ ४ ॥

दो०— कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब ।

भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब ॥ १९ ॥

कद्रूने विनताको दुःख दिया था, तुम्हें कौसल्या देगी । भरत कारागारका सेवन करेंगे (जेलकी हवा खायेंगे) और लक्ष्मण रामके नायब (सहकारी) होंगे ॥ १९ ॥