श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 362, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
कैकयसुता सुनत कटु बानी । कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी ॥ तन पसेउ कदली जिमि काँपी । कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी ॥
कैकेयी मन्थराकी कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती। शरीरमें पसीना हो आया और वह केलेकी तरह काँपने लगी। तब कुबरी (मन्थरा) ने अपनी जीभ दाँतों-तले दबायी (उसे भय हुआ कि कहीं भविष्यका अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयीके हृदयकी गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय) ॥ १ ॥
कहि कहि कोटिक कपट कहानी । धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी ॥ फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली । बकिहि सराहइ मनि मराली ॥
फिर कपटकी करोड़ों कहानियाँ कह-कहकर उसने रानीको खूब समझाया कि धीरज रखो! कैकेयीका भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी। वह बगुलीको हँसिनी मानकर (वैरिनको हित मानकर) उसकी सराहना करने लगी ॥ २ ॥
सुनु मंथरा बात फुरि तोरी । दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी ॥ दिन प्रति देखउँ राति कुसपने । कहउँ न तोहि मोह बस अपने ॥
कैकेयीने कहा—मन्थरा! सुन, तेरी बात सत्य है। मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़का करती है। मैं प्रतिदिन रातको बुरे स्वप्न देखती हूँ; किन्तु अपने अज्ञानवश तुझसे कहती नहीं ॥ ३ ॥
काह करौं सखि सूध सुभाऊ । दाहिन बाम न जानउँ काऊ ॥
सखी! क्या करूँ, मेरा तो सीधा स्वभाव है। मैं दायाँ-बायाँ कुछ भी नहीं जानती ॥ ४ ॥
दो० — अपने चलत न आजु लागि अनभल काहुक कीन्ह ।
केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह ॥ २० ॥
अपनी चलते (जहाँतक मेरा वश चला) मैंने आजतक कभी किसीका बुरा नहीं किया। फिर न जाने किस पापसे दैवने मुझे एक ही साथ यह दुःसह दुःख दिया ॥ २० ॥
नैहर जनमु भरब बरु जाई । जिअत न करबि सवति सेवकाई ॥ अरि बस दैउ जिआवत जाही । मरनु नीक तेहि जीवन चाही ॥
मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौतकी चाकरी नहीं करूँगी। दैव जिसको शत्रुके वशमें रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मरना ही अच्छा है ॥ १ ॥
दीन बचन कह बहुबिधि रानी । सुनि कुबरीं तियमाया ठानी ॥ अस कस कहहु मनि मन ऊना । सुखु सोहागु तुम्ह कहुं दिन दूना ॥