श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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रानीने बहुत प्रकारके दिन वचन कहे। उन्हें सुनकर कुबरीने त्रियाचरित्र फैलाया। [वह बोली—] तुम मनमें ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख-सुहाग दिन-दिन दूना होगा ॥ २ ॥
जेहिं राउर अति अनभल ताका । सोड़ पाइहि यहु फलु परिपाका ॥ जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि । भूख न बासर नीद न जामिनि ॥
जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाममें यह (बुराईरूप) फल पायेगी। हे स्वामिनि! मैंने जबसे यह कुमत सुना है, तबसे मुझे न तो दिनमें कुछ भूख लगती है और न रातमें नींद ही आती है ॥ ३ ॥
पूँछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची । भरत भुआल होहिं यह साँची ॥ भामिनि करहु त कहौं उपाऊ । है तुम्हरीं सेवा बस राऊ ॥
मैंने ज्योतिषियोंसे पूछा, तो उन्होंने रेखा खींचकर (गणित करके अथवा निश्चयपूर्वक) कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है। हे भामिनि! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊँ। राजा तुम्हारी सेवाके वशमें हैं ही ॥ ४ ॥
दो०—परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि ।
कहसि मोर दुखु देखि बड़ कसन कर बहित लागि ॥ २१ ॥
[कैकेयीने कहा—] मैं तेरे कहनेसे कुएँमें गिर सकती हूँ, पुत्र और पतिको भी छोड़ सकती हूँ। जब तू मेरा बड़ा भारी दुःख देखकर कुछ कहती है, तो भला मैं अपने हितके लिये उसे क्यों न करूँगी? ॥ २१ ॥
कुबरीं करि कबुली कैकेई । कपट छुरी उर पाहन टेई ॥ लखड़ न रानि निकट दुखु कैसैं । चरइ हरित तिन बलिपसु जैसैं ॥
कुबरीने कैकेयीको [सब तरहसे] कबूल करवाकर (अर्थात् बलिपशु बनाकर) कपटरूप छुरीको अपने [कठोर] हृदयरूपी पत्थरपर टेया (उसकी धारको तेज किया)। रानी कैकेयी अपने निकटके (शीघ्र आनेवाले) दुःखको कैसे नहीं देखती, जैसे बलिका पशु हरी-हरी घास चरता है [पर यह नहीं जानता कि मौत सिरपर नाच रही है] ॥ १ ॥
सुनत बात मृदु अंत कठोरी । देति मनहुं मधु माहुर घोरी ॥ कहड़ चेरि सुधि अहड़ कि नाहीं । स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं ॥
मन्थराकी बातें सुननेमें तो कोमल हैं, पर परिणाममें कठोर (भयानक) हैं। मानो वह शहदमें घोलकर जहर पिला रही हो। दासी कहती है—हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं? ॥ २ ॥