भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 364

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  • रामचरितमानस *

दुइ बरदान भूप सन थाती । मागहु आजु जुड़ावहु छाती ॥ सुतहि राजु रामहि बनबासू । देहु लेहु सब सवति हुलासू ॥

तुम्हारे दो बरदान राजाके पास धरोहर हैं। आज उन्हें राजासे माँगकर अपनी छाती ठंडी करो। पुत्रको राज्य और रामको वनवास दो और सौतका सारा आनन्द तुम ले लो ॥ ३ ॥

भूपति राम सपथ जब करई । तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई ॥ होइ अकाजु आजु निसि बीतें । बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें ॥

जब राजा रामकी सौगंध खा लें, तब वर माँगना, जिससे वचन न टलने पावे। आजकी रात बीत गयी, तो काम बिगड़ जायगा। मेरी बातको हृदयसे प्रिय [या प्राणोंसे भी प्यारी] समझना ॥ ४ ॥

दो०—बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगूहँ जाहु ।

काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु ॥ २२ ॥

पापिनी मन्थराने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा—कोपभवनमें जाओ। सब काम बड़ी सावधानीसे बनाना, राजापर सहसा विश्वास न कर लेना (उनकी बातोंमें न आ जाना) ॥ २२ ॥

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी । बार बार बड़ि बुद्धि बखानी ॥ तोहि सम हित न मोर संसारा । बहे जात कइ भइसि अधारा ॥

कुबरीको रानीने प्राणोंके समान प्रिय समझकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धिका बखान किया और बोली—संसारमें मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है। तू मुझ बही जाती हुईके लिये सहारा हुई है ॥ १ ॥

जौं बिधि पुरब मनोरथु काली । करौं तोहि चख पूतरि आली ॥ बहुबिधि चेरिहि आदरु देई । कोपभवन गवनी कैकेई ॥

यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दें तो हे सखी! मैं तुझे आँखोंकी पुतली बना लूँ। इस प्रकार दासीको बहुत तरहसे आदर देकर कैकेयी कोपभवनमें चली गयी ॥ २ ॥

बिपति बीजु बरषा रिनु चेरी । भुईं भइ कुमति कैकई केरी ॥ पाड़ कपट जलु अंकुर जामा । बर दोउ दल दुख फल परिनामा ॥

विपत्ति (कलह) बीज है, दासी वर्षा-ऋतु है, कैकेयीकी कुबुद्धि [उस बीजके बोनेके लिये] जमीन हो गयी। उसमें कपटरूपी जल पाकर अङ्कुर फूट निकला। दोनों बरदान उस अङ्कुरके दो पत्ते हैं और अन्तमें इसके दुःखरूपी फल होगा ॥ ३ ॥

कोप समाजु साजि सबु सोई । राजु करत निज कुमति बिगोई ॥ राउर नगर कोलाहलु होई । यह कुचालि कछु जान न कोई ॥

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