श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
३६५
सो० — बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि ।
कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर ॥ २५ ॥
राजा बार-बार कह रहे हैं—हे सुमुखी! हे सुलोचनी! हे कोकिलबयनी! हे गजगामिनी! मुझे अपने क्रोधका कारण तो सुना ॥ २५ ॥
अनहित तोर प्रिया केईं कीन्हा । केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा ॥ कहु केहि रंकहि करौं नरेसू । कहु केहि नृपहि निकासौं देसू ॥
हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं? यमराज किसको लेना (अपने लोकको ले जाना) चाहते हैं ? कह, किस कंगालको राजा कर दूँ या किस राजाको देशसे निकाल दूँ ॥ १ ॥
सकउँ तोर अरि अमरउ मारी । काह कीट बपुरे नर नारी ॥ जानसि मोर सुभाउ बरोरू । मनु तव आनन चंद चकोरू ॥
तेरा शत्रु अमर (देवता) भी हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूँ। बेचारे कीड़े-मकोड़े-सरीखे नर-नारी तो चीज ही क्या हैं। हे सुन्दरि! तू तो मेरा स्वभाव जानती ही है कि मेरा मन सदा तेरे मुखरूपी चन्द्रमाका चकोर है ॥ २ ॥
प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें । परिजन प्रजा सकल बस तोरें ॥ जौं कछु कहौं कपटु करि तोही । भामिनि राम सपथ सत मोही ॥
हे प्रिये! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व (सम्पत्ति), पुत्र, यहाँतक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वशमें (अधीन) हैं। यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊँ तो हे भामिनी! मुझे सौ बार रामकी सौगंध है ॥ ३ ॥
बिहसि मागु मनभावति बाता । भूषन सजहि मनोहर गाता ॥ घरी कुघरी समुझि जियँ देखू । बेगि प्रिया परिहरहि कुबेष् ॥
तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगोंको आभूषणोंसे सजा। मौका-बेमौका तो मनमें विचारकर देख। हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेषको त्याग दे ॥ ४ ॥
दो० — यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद ।
भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद ॥ २६ ॥
यह सुनकर और मनमें रामजीकी बड़ी सौगन्धको विचारकर मन्दबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृगको देखकर फंद तैयार कर रही हो! ॥ २६ ॥