श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
पुनि कह राउ सुहद जियँ जानी । प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी ॥ भामिनि भयउ तोर मनभावा । घर घर नगर अनंद बधावा ॥
अपने जीमें कैकेयीको सुहद जानकर राजा दशरथजी प्रेमसे पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणीसे फिर बोले—हे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया। नगरमें घर-घर आनन्दके बधावे बज रहे हैं ॥ १ ॥
रामहि देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचनि मंगल साजू ॥ दलकि उठेउ सुनि हदउ कठोरु । जनु छुइ गयउ पाक बरतोरु ॥
मैं कल ही रामको युवराज-पद दे रहा हूँ। इसलिये हे सुनयनी! तू मङ्गल-साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो ॥ २ ॥
ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई । चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई ॥ लखहिं न भूप कपट चतुराई । कोटि कुटिल मनि गुरु पढ़ाई ॥
ऐसी भारी पीड़ाको भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोरकी स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें उसका भेद न खुल जाय)। राजा उसकी कपट-चतुराईको नहीं लख रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलोंकी शिरोमणि गुरु मन्थराकी पढ़ायी हुई है ॥ ३ ॥
जद्यपि नीति निपुन नरनाहू । नारिचरित जलनिधि अवगाहू ॥ कपट सनेहु बढाइ बहोरी । बोली बिहसि नयन मुहु मोरी ॥
जद्यपि राजा नीतिमें निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर (ऊपरसे प्रेम दिखाकर) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली— ॥ ४ ॥
दो०—मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु ॥ २७ ॥
हे प्रियतम! आप माँग-माँग तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो बरदान देनेको कहा था, उनके भी मिलनेमें सन्देह है ॥ २७ ॥
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई । तुम्हि कोहाब परम प्रिय अहई ॥ थाती राखि न मागिहु काऊ । बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ ॥
राजाने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म (मतलब) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरोंको थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलनेका स्वभाव होनेसे मुझे भी वह प्रसङ्ग याद नहीं रहा ॥ १ ॥