श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 369, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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झूठेहूँ हमहि दोषु जनि देहू । दुइ कै चारि मागि मकु लेहू ॥ रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्रान जाहूँ बरु बचनु न जाई ॥
मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो । चाहे दोके बदले चार माँग लो । रघुकुलमें सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायँ, पर वचन नहीं जाता ॥ २ ॥
नहि असत्य सम पातक पुंजा । गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा ॥ सत्यमूल सब सुकृत सुहाए । बेद पुरान बिदित मनु गाए ॥
असत्यके समान पापोंका समूह भी नहीं है । क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़के समान हो सकती हैं । 'सत्य' ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों)-की जड़ है । यह बात वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और मनुजीने भी यही कहा है ॥ ३ ॥
तेहि पर राम सपथ करि आई । सुकृत सनेह अवधि रघुराई ॥ बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली । कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली ॥
उसपर मेरे द्वारा श्रीरामजीकी शपथ करनेमें आ गयी (मुँहसे निकल पड़ी) । श्रीरघुनाथजी मेरे सुकृत (पुण्य) और स्नेहकी सीमा हैं । इस प्रकार बात पक्की करके दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो उसने कुमत (बुरे विचार) रूपी दुष्ट पक्षी (बाज)-[को छोड़नेके लिये उस]-की कुलही (आँखोंपरकी टोपी) खोल दी ॥ ४ ॥
दो०—भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु । भिल्लिन जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु ॥ २८ ॥
राजाका मनोरथ सुन्दर वन है, सुख सुन्दर पक्षियोंका समुदाय है । उसपर भीलनीकी तरह कैकेयी अपना वचनरूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है ॥ २८ ॥
मासपारायण, तेरहवाँ विश्राम
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का । देहु एक बर भरतहि टीका ॥ मागउँ दूसर बर कर जोरी । पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी ॥
[वह बोली—] हे प्राणप्यारे ! सुनिये, मेरे मनको भानेवाला एक वर तो दीजिये, भरतको राजतिलक; और हे नाथ ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये— ॥ १ ॥
तापस बेष बिसेषि उदासी । चौदह बरिस रामु बनबासी ॥ सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू । ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू ॥