श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें३६८
- रामचरितमानस *
तपस्वियोंके वेषमें विशेष उदासीन भावसे (राज्य और कुटुम्ब आदिकी ओरसे भलीभाँति उदासीन होकर विरक्त मुनियोंकी भाँति) राम चौदह वर्षतक वनमें निवास करें। कैकेयीके कोमल (विनययुक्त) वचन सुनकर राजाके हृदयमें ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे चकवा विकल हो जाता है ॥ २ ॥
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा । जनु सचान बन झपटेउ लावा ॥ बिबरन भयउ निपट नरपालू । दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू ॥
राजा सहम गये, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज वनमें बटेरपर झपटा हो। राजाका रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़के पेड़को बिजलीने मारा हो (जैसे ताड़के पेड़पर बिजली गिरनेसे वह झूलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजाका हुआ) ॥ ३ ॥
माथें हाथ मूदि दोउ लोचन । तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन ॥ मोर मनोरथु सुरतरु फूला । फरत करिनि जिमि हतेउ समूला ॥
माथेपर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात् सोच ही शरीर धारणकर सोच कर रहा हो। [वे सोचते हैं—हाय!] मेरा मनोरथरूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयीने हथिनीकी तरह उसे जड़समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला ॥ ४ ॥
अवध उजारि कीन्हि कैकेई । दीन्हिसि अचल बिपति कै नेई ॥
कैकेयीने अयोध्याको उजाड़ कर दिया और विपत्तिकी अचल (सुदृढ़) नींव डाल दी ॥ ५ ॥
दो०—कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास ।
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्या नास ॥ २९ ॥
किस अवसरपर क्या हो गया! स्त्रीका विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योगकी सिद्धिरूपी फल मिलनेके समय योगीको अविद्या नष्ट कर देती है ॥ २९ ॥
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा । देखि कुभाँति कुमति मन माखा ॥
भरतु कि राउर पूत न होंही । आनेहु मोल बेसाहि कि मोही ॥
इस प्रकार राजा मन-ही-मन झाँख रहे हैं। राजाका ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मनमें बुरी तरहसे क्रोधित हुई। [और बोली—] क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं ? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाये हैं ? (क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ?) ॥ ११ ॥
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें । काहे न बोलहु बचनु सँभारें ॥
देहु उत्तरु अनु करहु कि नाही । सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं ॥