श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये—हाँ कीजिये, नहीं तो नहीं कर दीजिये। आप स्तुवशमें सत्य प्रतिज्ञावाले [प्रसिद्ध] हैं॥२॥
देन कहेहु अब जनि बरु देहू । तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥ सत्य सराहि कहेहु बरु देना । जानेहु लेइहि मागि चबेना॥
आपने ही वर देनेको कहा था, अब भले ही न दीजिये। सत्यको छोड़ दीजिये और जगत्में अपयश लीजिये। सत्यकी बड़ी सराहना करके वर देनेको कहा था। समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी॥३॥
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा । तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥ अति कटु बचन कहति कैकेई । मानहुँ लोन जरे पर देई॥
राजा शिबि, दधीचि और बलिनो जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचनकी प्रतिज्ञाको निबाहा। कैकेयी बहुत ही कड़वे वचन कह रही है, मानो जलेपर नमक छिड़क रही हो॥४॥
दो०—धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठार्यँ॥३०॥
धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले राजा दशरथने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा (ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया)॥३०॥
आगें दीखि जरत रिस भारी । मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥ मूठि कुबुद्धि धार निठुराई । धरी कूबरीं सान बनाई॥
प्रचण्ड क्रोधसे जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी (म्यानसे बाहर) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवारकी मूठ है, निष्ठरता धार है और वह कुबरी (मन्थरा) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है॥१॥
लखी महीप कराल कठोरा । सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥ बोले राउ कठिन करि छाती । बानी सबिनय तासु सोहाती॥
राजाने देखा कि यह (तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है [और सोचा—] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रताके साथ उसे(कैकेयीको)प्रिय लगनेवाली वाणी बोले—॥२॥
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती । भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥ मोरें भरतु रामु दुइ आँखी । सत्य कहउँ करि संकरु सारखी॥