भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 372

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  • रामचरितमानस *

हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास और प्रेमको नष्ट करके ऐसे बुरी तरहके वचन कैसे कह रही हो। मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें (अर्थात् एक-से) हैं; यह मैं शङ्करजीकी साक्षी देकर सत्य कहता हूँ ॥ ३ ॥

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता । ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भाता ॥ सुदिन सोधि सबु साजु सजाई । देउँ भरत कहूँ राजु बजाई ॥

मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूँगा। दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) सुनते ही तुरंत आ जायँगे। अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरतको राज्य दे दूँगा ॥ ४ ॥

दो०—लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।

मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति ॥ ३१ ॥

रामको राज्यका लोभ नहीं है और भरतपर उनका बड़ा ही प्रेम है। मैं ही अपने मनमें बड़े-छोटेका विचार करके राजनीतिका पालन कर रहा था (बड़ेको राजतिलक देने जा रहा था) ॥ ३१ ॥

राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ॥ मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूछें । तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें ॥

रामकी सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभावसे ही कहता हूँ कि रामकी माता (कौसल्या)-ने [इस विषयमें] मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया। इसीसे मेरा मनोरथ खाली गया ॥ १ ॥

रिस परिहरु अब मंगल साजू । कछु दिन गऐं भरत जुबराजू ॥ एकहि बात मोहि दुखु लाग। बर दूसर असमंजस मागा ॥

अब क्रोध छोड़ दे और मङ्गल साज सज। कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जायँगे। एक ही बातका मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चनका माँगा ॥ २ ॥

अजहूँ हदउ जरत तेहि आँचा । रिस परिहास कि साँचेहूँ साँचा ॥ कहु तजि रोषु राम अपराधू । सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू ॥

उसकी आँचसे अब भी मेरा हृदय जल रहा है। यह दिल्लगीमें, क्रोधमें अथवा सचमुच ही (वास्तवमें) सच्चा है? क्रोधको त्यागकर रामका अपराध तो बता। सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं ॥ ३ ॥

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू । अब सुनि मोहि भयउ संदेहू ॥ जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला । सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला ॥