श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अयोध्याकाण्ड *
३६१
जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये—हाँ कीजिये, नहीं तो नहीं कर दीजिये। आप स्तुवशमें सत्य प्रतिज्ञावाले [प्रसिद्ध] हैं॥२॥
देन कहेहु अब जनि बरु देहू । तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥ सत्य सराहि कहेहु बरु देना । जानेहु लेइहि मागि चबेना॥
आपने ही वर देनेको कहा था, अब भले ही न दीजिये। सत्यको छोड़ दीजिये और जगत्में अपयश लीजिये। सत्यकी बड़ी सराहना करके वर देनेको कहा था। समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी॥३॥
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा । तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥ अति कटु बचन कहति कैकेई । मानहुँ लोन जरे पर देई॥
राजा शिबि, दधीचि और बलिनो जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचनकी प्रतिज्ञाको निबाहा। कैकेयी बहुत ही कड़वे वचन कह रही है, मानो जलेपर नमक छिड़क रही हो॥४॥
दो०—धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठार्यँ॥३०॥
धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले राजा दशरथने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा (ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया)॥३०॥
आगें दीखि जरत रिस भारी । मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥ मूठि कुबुद्धि धार निठुराई । धरी कूबरीं सान बनाई॥
प्रचण्ड क्रोधसे जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी (म्यानसे बाहर) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवारकी मूठ है, निष्ठरता धार है और वह कुबरी (मन्थरा) रूपी सानपर धरकर तेज की हुई है॥१॥
लखी महीप कराल कठोरा । सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥ बोले राउ कठिन करि छाती । बानी सबिनय तासु सोहाती॥
राजाने देखा कि यह (तलवार) बड़ी ही भयानक और कठोर है [और सोचा—] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रताके साथ उसे(कैकेयीको)प्रिय लगनेवाली वाणी बोले—॥२॥
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती । भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥ मोरें भरतु रामु दुइ आँखी । सत्य कहउँ करि संकरु सारखी॥
३७०
- रामचरितमानस *
हे प्रिये! हे भीरु! विश्वास और प्रेमको नष्ट करके ऐसे बुरी तरहके वचन कैसे कह रही हो। मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आँखें (अर्थात् एक-से) हैं; यह मैं शङ्करजीकी साक्षी देकर सत्य कहता हूँ ॥ ३ ॥
अवसि दूतु मैं पठइब प्राता । ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भाता ॥ सुदिन सोधि सबु साजु सजाई । देउँ भरत कहूँ राजु बजाई ॥
मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूँगा। दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) सुनते ही तुरंत आ जायँगे। अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरतको राज्य दे दूँगा ॥ ४ ॥
दो०—लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति ॥ ३१ ॥
रामको राज्यका लोभ नहीं है और भरतपर उनका बड़ा ही प्रेम है। मैं ही अपने मनमें बड़े-छोटेका विचार करके राजनीतिका पालन कर रहा था (बड़ेको राजतिलक देने जा रहा था) ॥ ३१ ॥
राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ॥ मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूछें । तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें ॥
रामकी सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभावसे ही कहता हूँ कि रामकी माता (कौसल्या)-ने [इस विषयमें] मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया। इसीसे मेरा मनोरथ खाली गया ॥ १ ॥
रिस परिहरु अब मंगल साजू । कछु दिन गऐं भरत जुबराजू ॥ एकहि बात मोहि दुखु लाग। बर दूसर असमंजस मागा ॥
अब क्रोध छोड़ दे और मङ्गल साज सज। कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जायँगे। एक ही बातका मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चनका माँगा ॥ २ ॥
अजहूँ हदउ जरत तेहि आँचा । रिस परिहास कि साँचेहूँ साँचा ॥ कहु तजि रोषु राम अपराधू । सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू ॥
उसकी आँचसे अब भी मेरा हृदय जल रहा है। यह दिल्लगीमें, क्रोधमें अथवा सचमुच ही (वास्तवमें) सच्चा है? क्रोधको त्यागकर रामका अपराध तो बता। सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं ॥ ३ ॥
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू । अब सुनि मोहि भयउ संदेहू ॥ जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला । सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३७१
तू स्वयं भी रामकी सराहना करती और उनपर स्नेह किया करती थी। अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है [कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे ?] जिसका स्वभाव शत्रुको भी अनुकूल है, वह माताके प्रतिकूल आचरण क्यों कर करेगा ? ॥ ४ ॥
दो०—प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु ।
जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु ॥ ३२ ॥
हे प्रिये ! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक (उचित-अनुचित) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरतका राज्याभिषेक देख सकूँ ॥ ३२ ॥
जिए मीन बरु बारि बिहीना । मनि बिनु फनिकु जिए दुख दीना ॥
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥
मछली चाहे बिना पानीके जीती रहे और सौंप भी चाहे बिना मणिके दीन-दुखी होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, मनमें [जरा भी] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन रामके बिना नहीं है ॥ १ ॥
समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना । जीवनु राम दरस आधीना ॥
सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई । मनहुँ अनल आहुति घृत परई ॥
हे चतुर प्रिये ! जीमें समझ देख, मेरा जीवन श्रीरामके दर्शनके अधीन है। राजाके कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है। मानो अग्रिममें घीकी आहुतियाँ पड़ रही हैं ॥ २ ॥
कहइ करहु किन कोटि उपाया । इहाँ न लागिहि राउरि माया ॥
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं । मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं ॥
[कैकेयी कहती है—] आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहाँ आपकी माया (चालबाजी) नहीं लगेगी। या तो मैंने जो माँगा है सो दीजिये, नहीं तो 'नाहीं' करके अपयश लीजिये। मुझे बहुत प्रपञ्च (बखेड़े) नहीं सुहाते ॥ ३ ॥
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने । राममातु भलि सब पहिचाने ॥
जस कौसिलाँ मोर भल ताका । तस फलु उन्हहि देउँ करि साका ॥
राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और रामकी माता भी भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है। कौसल्याने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका करके (याद रखनेयोग्य) उन्हें वैसा ही फल दूँगी ॥ ४ ॥
दो०—होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं ।
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं ॥ ३३ ॥
सबेरा होते ही मुनिका वेष धारणकर यदि राम वनको नहीं जाते, तो हे राजन् ! मनमें [निश्चय] समझ लीजिये कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश ! ॥ ३३ ॥
३७२
- रामचरितमानस *
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी । मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी ॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई । भरी क्रोध जल जाइ न जोई ॥
ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोधकी नदी उमड़ी हो। वह नदी पापरूपी पहाड़से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जलसे भरी है; [ऐसी भयानक है कि] देखी नहीं जाती! ॥ १ ॥
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा । भवँर कूबरी बचन प्रचारा ॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला । चली बिपति बारिधि अनुकूला ॥
दोनों वरदान उस नदीके दो किनारे हैं, कैकेयीका कठिन हठ ही उसकी [तीव्र] धारा है और कुबरी (मन्थरा)-के वचनोंकी प्रेरणा ही भँवर है। [वह क्रोधरूपी नदी] राजा दशरथरूपी वृक्षको जड़-मूलसे ढहाती हुई विपत्तिरूपी समुद्रकी ओर [सीधी] चली हैं ॥ २ ॥
लखी नरेस बात फुरि साँची । तिय मिस मीचु सीस पर नाची ॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी । जनि दिनकर कुल होसि कुठारी ॥
राजाने समझ लिया कि बात सचमुच (वास्तवमें) सच्ची है, स्त्रीके बहाने मेरी मृत्यु ही सिरपर नाच रही है। [तदनन्तर राजाने कैकेयीके] चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल-[रूपी वृक्ष] के लिये कुल्हाड़ी मत बन ॥ ३ ॥
मागु माथ अबहीं देउँ तोही । राम बिरहँ जनि मारसि मोही ॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती । नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती ॥
तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर रामके विरहमें मुझे मत मार। जिस किसी प्रकारसे हो तू रामको रख ले। नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी ॥ ४ ॥
दो०—देखी व्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ ।
कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ ॥ ३४ ॥
राजाने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणीसे 'हा राम! हा राम! हा रघुनाथ!' कहते हुए सिर पीटकर जमीनपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥
व्याकुल राउ सिथिल सब गाता । करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता ॥ कंटु सूख मुख आव न बानी । जनु पाठीनु दीन बिनु पानी ॥
राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनीने कल्पवृक्षको उखाड़ फेंका हो। कण्ठ सूख गया, मुखसे बात नहीं निकलती, मानो पानीके बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो ॥ १ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३७३
पुनि कह कटु कठोर कैकेई । मनहुँ घाय महँ माहुर देई ॥ जौ अंतहुँ अस करतबु रहेऊ । मागु मागु तुम्ह केहिँ बल कहेऊ ॥
कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घावमें जहर भर रही हो। [कहती है—] जो अन्तमें ऐसा ही करना था, तो आपने 'माँग, माँग' किस बलपर कहा था ॥ २ ॥
दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठठाइ फुलाउब गाला ॥ दानि कहाउब अरु कूपनाई । होइ कि खेम कुसल रौताई ॥
हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना—क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना। क्या रजपूतीमें क्षेम-कुशल भी रह सकती है? (लड़ाईमें बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे!) ॥ ३ ॥
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू । जनि अबला जिमि करुना करहू ॥ तनु तिय तनय धामु धनु धरनी । सत्यसंध कहँ तून सम बरनी ॥
या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये-पीटिये नहीं। सत्यव्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी—सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं ॥ ४ ॥
दो०—मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर । लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर ॥ ३५ ॥
कैकेयीके मर्मभेदी वचन सुनकर राजाने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है। मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है ॥ ३५ ॥
चहत न भरत भूपतहि भोरें । बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें ॥ सो सबु मोर पाप परिनामू । भयउ कुठाहर जेहिँ बिधि बामू ॥
भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जीमें कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापोंका परिणाम है, जिससे कुसमयमें (बेमौके) विधाता विपरीत हो गया ॥ १ ॥
सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई । सब गुन धाम राम प्रभुताई ॥ करिहिं भाइ सकल सेवकाई । होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई ॥
[तेरी उजाड़ी हुई] यह सुन्दर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणोंके धाम श्रीरामकी प्रभुता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकोंमें श्रीरामकी बड़ाई होगी ॥ २ ॥
तोर कलंकु मोर पछिताऊ । मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई । लोचन ओट बैठु मुहु गोई ॥
३७४
- रामचरितमानस *
केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरनेपर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा। अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर। मुँह छिपाकर मेरी आँखोंकी ओट जा बैठ (अर्थात् मेरे सामनेसे हट जा, मुझे मुँह न दिखा) ॥ ३ ॥
जब लगि जिऔँ कहउँ कर जोरी । तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी ॥ फिरि पछितैहसि अंत अभागी । मारसि गाड़ नहारू लागी ॥
मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जबतक मैं जीता रहूँ, तबतक फिर कुछ न कहना (अर्थात् मुझसे न बोलना)। अरी अभागिनी! फिर तू अन्तमें पछतायेगी जो तू नहारू (ताँत) के लिये गायको मार रही है ॥ ४ ॥
दो०—परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु । कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु ॥ ३६ ॥
राजा करोड़ों प्रकारसे (बहुत तरहसे) समझाकर [और यह कहकर] कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वीपर गिर पड़े। पर कपट करनेमें चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो [मौन होकर] मसान जगा रही हो (शमशानमें बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध कर रही हो) ॥ ३६ ॥
राम राम रट बिकल भुआलू । जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ॥ हृदयँ मनाव भोरु जनि होई । रामहि जाड़ कहै जनि कोई ॥
राजा 'राम-राम' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंखके बिना बेहाल हो। वे अपने हृदयमें मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात न कहे ॥ १ ॥
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर । अवध बिलोकि सूल होइहि उर ॥ भूप प्रीति कैकड़ कठिनाई । उभय अवधि बिधि रची बनाई ॥
हे रघुकुलके गुरु (बड़ेरे मूलपुरुष) सूर्यभगवान्! आप अपना उदय न करें। अयोध्याको [बेहाल] देखकर आपके हृदयमें बड़ी पीड़ा होगी। राजाकी प्रीति और कैकेयीकी निष्कृता दोनोंको ब्रह्मणे सीमातक रचकर बनाया है (अर्थात् राजा प्रेमकी सीमा हैं और कैकेयी निष्कृताकी) ॥ २ ॥
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा । बीना बेनु संख धुनि द्वारा ॥ पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक । सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक ॥
विलाप करते-करते ही राजाको सबेरा हो गया। राजद्वारपर वीणा, बाँसुरी और शंखकी ध्वनि होने लगी। भाटलोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणोंका गान कर रहे हैं। सुननेपर राजाको वे बाण-जैसे लगते हैं ॥ ३ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३७५
मंगल सकल सोहाहिं न कैसैं। सहगामिनिहि बिभूषन जैसैं॥ तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥
राजाको ये सब मङ्गल-साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पतिके साथ सती होनेवाली स्त्रीको आभूषण! श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहेके कारण उस रात्रिमें किसीको भी नींद नहीं आयी ॥ ४ ॥
दो०—द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि ॥ ३७ ॥
राजद्वारपर मन्त्रियों और सेवकोंकी भीड़ लगी है। वे सब सूर्यको उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन-सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभीतक नहीं जागे? ॥ ३७ ॥
पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागगा ॥ जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥
राजा नित्य ही रातके पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमन्त्र! जाओ, जाकर राजाको जगाओ। उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें ॥ १ ॥
गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं॥ धाड़ खाड़ जनु जाड़ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥
तब सुमन्त्र रावले (राजमहल)में गये, पर महलको भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं। [ऐसा लगता है] मानो दौड़कर काट खायेगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता। मानो विषादने वहाँ डेरा डाल रखा हो ॥ २ ॥
पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥ कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥
पूछनेपर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महलमें गये, जहाँ राजा और कैकेयी थे। 'जय-जीव' कहकर सिर नवाकर (वन्दना करके) बैठे और राजाकी दशा देखकर तो वे सूख ही गये ॥ ३ ॥
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥ सचिउ सभीत सकड़ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छुँछी॥
[देखा कि—] राजा सोचसे व्याकुल हैं, चेहरेका रंग उड़ गया है। जमीनपर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़से उखड़कर) [मुर्झाया] पड़ा हो। मन्त्री मारे डरके कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभसे भरी हुई और शुभसे विहीन कैकेयी बोली— ॥ ४ ॥
३७६
- रामचरितमानस *
दो०—परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु ॥ ३८ ॥
राजाको रातभर नींद नहीं आयी, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें। इन्होंने 'राम-राम' रटकर सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते ॥ ३८ ॥
आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥ चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥
तुम जल्दी रामको बुला लाओ। तब आकर समाचार पूछना। राजाका रुख जानकर सुमन्त्रजी चले, समझ गये कि रानीने कुछ कुचाल की है ॥ १ ॥
सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥ उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछिहँ सकल देखि मनु मारें॥
सुमन्त्र सोचसे व्याकुल हैं, रास्तेपर पैर नहीं पड़ता (आगे बढ़ा नहीं जाता), [सोचते हैं—] रामजीको बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी तरह हृदयमें धीरज धरकर वे द्वारपर गये। सब लोग उनको मनमारे (उदास) देखकर पूछने लगे ॥ २ ॥
समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥ राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥
सब लोगोंका समाधान करके (किसी तरह समझा-बुझाकर) सुमन्त्र वहाँ गये, जहाँ सूर्यकुलके तिलक श्रीरामचन्द्रजी थे। श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको आते देखा तो पिताके समान समझकर उनका आदर किया ॥ ३ ॥
निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥ रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥
श्रीरामचन्द्रजीके मुखको देखकर और राजाकी आज्ञा सुनाकर वे रघुकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीको [अपने साथ] लिवा चले। श्रीरामचन्द्रजी मन्त्रीके साथ बुरी तरहसे (बिना किसी लवाजमेके) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ-तहाँ विषाद कर रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०—जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु। सहमि परेउ लखि सिंधिनिहि मनहुँ बूद्ध गजराजु ॥ ३९ ॥
रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालतमें पड़े हैं, मानो सिंहनीको देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो ॥ ३९ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३७७
सूरखिं अधर जरइ सबु अंगू । मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू ॥ सरुष समीप दीखि कैकेई । मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई ॥
राजाके ओठ सूरख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणिके बिना साँप दुःखी हो रहा हो। पास ही क्रोधसे भरी कैकेयीको देखा, मानो [साक्षात्] मृत्यु ही बैठी [राजाके जीवनकी अन्तिम] घड़ियाँ गिन रही हो ॥ १ ॥
करुनामय मृदु राम सुभाऊ । प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ ॥ तदपि धीर धरि समउ बिचारी । पूँछी मधुर बचन महतारी ॥
श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने [अपने जीवनमें] पहली बार यह दुःख देखा; इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। तो भी समयका विचार करके हृदयमें धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनोंसे माता कैकेयीसे पूछा— ॥ २ ॥
मोहि कहु मातु तात दुख कारण । करिअ जतन जेहिं होइ निवारन ॥ सुनहु राम सबु कारनु एहू । राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू ॥
हे माता! मुझे पिताजीके दुःखका कारण कहो ताकि जिससे उसका निवारण हो (दुःख दूर हो) वह यत्न किया जाय। [कैकेयीने कहा—] हे राम! सुनो, सारा कारण यही है कि राजाका तुमपर बहुत स्नेह है ॥ ३ ॥
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना । मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना ॥ सो सुनि भयउ भूप उर सोचू । छाड़ि न सकहिं तुम्हार संकोचू ॥
इहोंने मुझे दो वरदान देनेको कहा था। मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वही मैंने माँगा। उसे सुनकर राजाके हृदयमें सोच हो गया; क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते ॥ ४ ॥
दो०—सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।
सकहु त आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु ॥ ४० ॥
इधर तो पुत्रका स्नेह है और उधर वचन (प्रतिज्ञा); राजा इसी धर्मसंकटमें पड़ गये हैं। यदि तुम कर सकते हो, तो राजाकी आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेशको मिटाओ ॥ ४० ॥
निधरक बैठि कहइ कटु बानी । सुनत कठिना अति अकुलानी ॥ जीभ कमान बचन सर नाना । मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना ॥
कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी वाणी कह रही है जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो उठी। जीभ धनुष है, वचन बहुत-से तीर हैं और मानो राजा ही कोमल निशानेके समान हैं ॥ १ ॥
३७८
- रामचरितमानस *
जनु कठोरपनु धरें सरीरू । सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू ॥ सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई । बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई ॥
[इस सारे साज-सामानके साथ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीरका शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है। श्रीरघुनाथजीको सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो ॥ २ ॥
मन मुसुकाइ भानुकुल भानू । रामु सहज आनंद निधानू ॥ बोले बचन बिगत सब दूषन । मूदु मंजुल जनु बाग बिभूषन ॥
सूर्यकुलके सूर्य, स्वाभाविक ही आनन्दनिधान श्रीरामचन्द्रजी मनमें मुसकराकर सब दूषणोंसे रहित ऐसे कोमल और सुन्दर बचन बोले जो मानो वाणीके भूषण ही थे— ॥ ३ ॥
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी । जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥ तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥
हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माताके बचनोंका अनुरागी (पालन करनेवाला) है। [आज्ञा-पालनके द्वारा] माता-पिताको सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी! सारे संसारमें दुर्लभ है ॥ ४ ॥
दो०—मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर । तेहि महाँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर ॥ ४१ ॥
वनमें विशेषरूपसे मुनियोंका मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकारसे कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजीकी आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है ॥ ४१ ॥
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू । बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू ॥ जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा । प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा ॥
और प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे। [इन सभी बातोंको देखकर यह प्रतीत होता है कि] आज विधाता सब प्रकारसे मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं)। यदि ऐसे कामके लिये भी मैं वनको न जाऊँ तो मूर्खोंके समाजमें सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये ॥ १ ॥
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी । परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी ॥ तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं । देखु बिचारि मातु मन माहीं ॥
जो कल्पवृक्षको छोड़कर रेंड़की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मनमें विचारकर देखो, वे (महामूर्ख)भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे ॥ २ ॥
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी । निपट बिकल नरनायकु देखी ॥ थोरिहि बात पितहि दुख भारी । होति प्रतीति न मोहि महतारी ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३७९
हे माता! मुझे एक ही दुःख विशेषरूपसे हो रहा है, वह महाराजको अत्यन्त व्याकुल देखकर। इस थोड़ी-सी बातके लिये ही पिताजीको इतना भारी दुःख हो, हे माता! मुझे इस बातपर विश्वास नहीं होता ॥ ३ ॥
राउ धीर गुन उदधि अगाधू । भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू ॥ जातें मोहि न कहत कछु राऊ । मोरि सपथ तोहि कहु सति भाऊ ॥
क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणोंके अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगन्ध है, माता! तुम सच-सच कहो ॥ ४ ॥
दो०—सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान ।
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान ॥ ४२ ॥
रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावसे ही सीधे वचनोंको दुर्बुद्धि कैकेयी टेढ़ा ही करके जान रही है; जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें टेढ़ी चालसे ही चलती है ॥ ४२ ॥
रहसी रानि राम रुख पाई । बोली कपट सनेहु जनाई ॥ सपथ तुम्हार भरत कै आना । हेतु न दूसर मैं कछु जाना ॥
रानी कैकेयी श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर हर्षित हो गयी और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली—तुम्हारी शपथ और भरतकी सौगन्ध है, मुझे राजाके दुःखका दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है ॥ १ ॥
तुम्ह अपराध जोगु नहीं ताता । जननी जनक बंधु सुखदाता ॥ राम सत्य सबु जो कछु कहहू । तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ॥
हे तात! तुम अपराधके योग्य नहीं हो (तुमसे माता-पिताका अपराध बन पड़े, यह सम्भव नहीं)। तुम तो माता-पिता और भाइयोंको सुख देनेवाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता-माताके वचनों [के पालन] में तत्पर हो ॥ २ ॥
पितहि बुझाइ कहहू बलि सोई । चौथेंपन जेहिं अजसु न होई ॥ तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे । उचित न तासु निरादरु कीन्हे ॥
मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिताको समझाकर वही बात कहो जिससे चौथेपन (बुढ़ापे) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्यने इनको तुम-जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं ॥ ३ ॥
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे । मगहैं गयादिक तीरथ जैसे ॥ रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ॥
३८०
- रामचरितमानस *
कैकेयीके बुरे मुखमें ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देशमें गया आदिक तीर्थ! श्रीरामचन्द्रजीको माता कैकेयीके सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गङ्गाजीमें जाकर [अच्छे-बुरे सभी प्रकारके] जल शुभ, सुन्दर हो जाते हैं ॥ ४ ॥
दो०—गड़ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह ।
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह ॥ ४३ ॥
इतनेमें राजाकी मूर्च्छा दूर हुई, उन्होंने रामका स्मरण करके ('राम-राम!' कहकर) फिरकर करवट ली। मन्त्रीने श्रीरामचन्द्रजीका आना कहकर समयानुकूल विनती की ॥ ४३ ॥
अवनिप अकनि रामु पगु धारे । धरि धीरजु तब नयन उघारे ॥ सचिवँ सँभारि राउ बैठारे । चरन परत नृप रामु निहारे ॥
जब राजाने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मन्त्रीने सँभालकर राजाको बैठाया। राजाने श्रीरामचन्द्रजीको अपने चरणोंमें पड़ते (प्रणाम करते) देखा ॥ १ ॥
लिए सनेह बिकल उर लाई । गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई ॥ रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । चला बिलोचन बारि प्रबाहू ॥
स्नेहसे विकल राजाने रामजीको हृदयसे लगा लिया। मानो साँपने अपनी खोयी हुई मणि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी श्रीरामजीको देखते ही रह गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली ॥ २ ॥
सोक बिबस कछु कहै न पारा । हृदयँ लगावत बारहि बारा ॥ बिधिहि मनाव राउ मन माहीं । जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं ॥
शोकके विशेष वश होनेके कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगाते हैं और मनमें ब्रह्माजीको मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी बनको न जार्यें ॥ ३ ॥
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी । बिनती सुनहु सदासिव मोरी ॥ आसुतोष तुम्ह अवढर दानी । आरति हरहु दीन जनु जानी ॥
फिर महादेवजीका स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं—हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होनेवाले) और अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालनेवाले) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःखको दूर कीजिये ॥ ४ ॥
दो०—तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु ।
बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु ॥ ४४ ॥
आप प्रेरकरूपसे सबके हृदयमें हैं। आप श्रीरामचन्द्रको ऐसी बुद्धि दीजिये जिससे वे मेरे वचनको त्यागकर और शील-स्नेहको छोड़कर घरहीमें रह जायें ॥ ४४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८१
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ । नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ ॥ सब दुख दुसह सहावहु मोही । लोचन ओट रामु जनि होंही ॥
जगत्में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे [नया पाप होनेसे] मैं नरकमें गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाय (पूर्व पुण्योंके फलस्वरूप मिलनेवाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले)। और भी सब प्रकारके दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आँखोंकी ओट न हों ॥ १ ॥
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला । पीपर पात सरिस मनु डोला ॥ रघुपति पितहि प्रेमबस जानी । पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी ॥
राजा मन-ही-मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपलके पत्तेकी तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजीने पिताको प्रेमके वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [तो पिताजीको दुःख होगा]— ॥ २ ॥
देस काल अवसर अनुसारि । बोले बचन बिनीत बिचारी ॥ तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई । अनुचितु छमब जानि लरिकाई ॥
देश, काल और अवसरके अनुकूल विचारकर विनीत वचन कहे—हे तात! मैं कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्यको मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजियेगा ॥ ३ ॥
अति लघु बात लागि दुखु पावा । काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा ॥ देखि गोसाईँहि पूँछिउँ माता । सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता ॥
इस अत्यन्त तुच्छ बातके लिये आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसीने पहले कहकर यह बात नहीं जनायी। स्वामी (आप) को इस दशामें देखकर मैंने मातासे पूछा। उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये (मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई) ॥ ४ ॥
दो०—मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात ॥ ४५ ॥
हे पिताजी! इस मङ्गलके समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिये और हृदयमें प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिये। यह कहते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सर्वाङ्ग पुलकित हो गये ॥ ४५ ॥
धन्य जनमु जगतीतल तासू । पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू ॥ चारि पदारथ करतल ताकें । प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें ॥
३८२
- रामचरितमानस *
[उन्होंने फिर कहा—] इस पृथ्वीतलपर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिताको परम आनन्द हो। जिसको माता-पिता प्राणोंके समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उसके करतलगत (मुट्टीमें) रहते हैं ॥ १ ॥
आयसु पालि जनम फलु पाई । ऐहउँ बेगिहिं होउ रजार्ई ॥ बिदा मातु सन आवउँ मागी । चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी ॥
आपकी आज्ञा पालन करके और जन्मका फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अतः कृपया आज्ञा दीजिये। मातासे विदा माँग आता हूँ। फिर आपके पैर लगकर (प्रणाम करके) वनको चल्तूँगा ॥ २ ॥
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा । भूप सोक बस उतरु न दीन्हा ॥ नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी । छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी ॥
ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे चल दिये। राजाने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी (अप्रिय) बात नगरभरमें इतनी जल्दी फैल गयी मानो डंक मारते ही बिच्छूका विष सारे शरीरमें चढ़ गया हो ॥ ३ ॥
सुनि भए बिकल सकल नर नारी । बेलि बिटप जिमि देखि दवारी ॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई । बड़ विषादु नहिं धीरजु होई ॥
इस बातको सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल (वनमें आग लगी) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने (पीटने) लगता है! बड़ा विषाद है, किसीको धीरज नहीं बँधता ॥ ४ ॥
दो०—मुख सुखाहिं लोचन स्वरहिं सोकु न हृदयँ समाइ । मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ ॥ ४६ ॥
सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखोंसे आँसू बहते हैं, शोक हृदयमें नहीं समाता। मानो करुणारसकी सेना अवधपर डंका बजाकर उत्तर आयी हो ॥ ४६ ॥
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी । जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी ॥ एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ । छाइ भवन पर पावकु धरेऊ ॥
सब मेल मिल गये थे (सब संयोग ठीक हो गये थे), इतनेमें ही विधाताने बात बिगाड़ दी! जहाँ-तहाँ लोग कैकेयीको गाली दे रहे हैं! इस पापिनको क्या सूझ पड़ा जो इसने छाये घरपर आग रख दी ॥ १ ॥
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा । डारि सुधा बिषु चाहत चीखा ॥ कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी । भइ रघुबंस बेनु बन आगी ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८३
यह अपने हाथसे अपनी आँखोंको निकालकर (आँखोंके बिना ही) देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंशरूपी बाँसके बनके लिये अग्नि हो गयी!! २ ॥
पालव बैठि पेड़ एहिं काटा । सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा ॥ सदा रामु एहि प्रान समाना । कारन कवन कुटिलपनु ठाना ॥
पतेपर बैठकर इसने पेड़को काट डाला। सुखमें शोकका टाट ठटकर रख दिया! श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणोंके समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी ॥ ३ ॥
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ । सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ ॥ निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ॥
कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्रीका स्वभाव सब प्रकारसे पकड़में आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाय, पर भाई! स्त्रियोंकी गति (चाल) नहीं जानी जाती ॥ ४ ॥
दो०—काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥ ४७ ॥
आग क्या नहीं जला सकती! समुद्रमें क्या नहीं समा सकता! अबला कहनेवाली प्रबल स्त्री [जाति] क्या नहीं कर सकती! और जगत्में काल किसको नहीं खाता!! ४७ ॥
का सुनाइ बिधि काह सुनावा । का देखाइ चह काह देखावा ॥ एक कहहिं भल भूप न कीन्हा । बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा ॥
विधाताने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजाने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयीको विचारकर वर नहीं दिया, ॥ १ ॥
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु । अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु ॥ एक धरम परमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने ॥
जो हठ करके (कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखोंके पात्र हो गये। स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते ॥ २ ॥
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी । एक एक सन कहहिं बखानी ॥ एक भरत कर संमत कहहीं । एक उदास भायँ सुनि रहहीं ॥
वे शिबि, दधीचि और हरिश्रन्द्रकी कथा एक दूसरेसे बखानकर कहते हैं। कोई एक इसमें भरतजीकी सम्मति बताते हैं। कोई एक सुनकर उदासीनभावसे रह जाते हैं (कुछ बोलते नहीं) ॥ ३ ॥
३८४
- रामचरितमानस *
कान मूँदि कर रद गहि जीहा । एक कहहिं यह बात अलीहा ॥ सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे । रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे ॥
कोई हाथोंसे कान मूँदकर और जीभको दाँतोंतले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहनेसे तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जायेंगे। भरतजीको तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंके समान प्यारे हैं ॥ ४ ॥
दो०—चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल ।
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल ॥ ४८ ॥
चन्द्रमा चाहे [शीतल किरणोंकी जगह] आगकी चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विषके समान हो जाय, परन्तु भरतजी स्वप्नमें भी कभी श्रीरामचन्द्रजीके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे ॥ ४८ ॥
एक बिधातहि दूषनु देहीं । सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं ॥
खरभरु नगर सोचु सब काहू । दुसह दाहु उर मिटा उछाहू ॥
कोई एक विधाताको दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगरभरमें खलबली मच गयी, सब किसीको सोच हो गया। हृदयमें दुःसह जलन हो गयी, आनन्द-उत्साह मिट गया ॥ १ ॥
बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी । जे प्रिय परम कैकई केरी ॥
लगीं देन सिख सीलु सराही । बचन बानसम लागहिं ताही ॥
ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ, कुलकी माननीय बड़ी-बूढ़ी और जो कैकेयीकी परम प्रिय थीं, वे उसके शीलकी सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाणके समान लगते हैं ॥ २ ॥
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना । सदा कहहु यहु सबु जगु जाना ॥
करहु राम पर सहज सनेहू । केहिं अपराध आजु बनु देहू ॥
[वे कहती हैं—] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्रके समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं; इस बातको सारा जगत् जानता है। श्रीरामचन्द्रजीपर तो तुम स्वाभाविक ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराधसे उन्हें वन देती हो? ॥ ३ ॥
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू । प्रीति प्रतीति जान सबु देसू ॥
कौसल्याँ अब काह बिगारा । तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा ॥
तुमने कभी सौतियाडाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वासको जानता है। अब कौसल्याने तुम्हारा कौन-सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगरपर वज्र गिरा दिया ॥ ४ ॥
दो०—सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहिं धाम ।
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम ॥ ४९ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८५
क्या सीताजी अपने पति (श्रीरामचन्द्रजी)-का साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना घर रह सकेंगे? क्या भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यापुरीका राज्य भोग सकेंगे? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीवित रह सकेंगे? (अर्थात् न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा) ॥ ४९ ॥
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू । सोक कलंक कोठि जनि होहू ॥ भरतहि अवसि देहु जुबराजू । कानन काह राम कर काजू ॥
हृदयमें ऐसा विचारकर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलङ्क की कोठी मत बनो। भरतको अवश्य युवराजपद दो, पर श्रीरामचन्द्रजीका वनमें क्या काम है! ॥ १ ॥
नाहिन रामु राज के भूखे । धरम धुरीन बिषय रस रूखे ॥ गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू । नृप सन अस बरु दूसर लेहू ॥
श्रीरामचन्द्रजी राज्यके भूखे नहीं हैं। वे धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले और विषय-रससे रूखे हैं (अर्थात् उनमें विषयासक्ति है ही नहीं)। [इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्रीरामजी वन न गये तो भरतके राज्यमें विघ्न करेंगे; इतनेपर भी मन न माने तो] तुम राजासे दूसरा ऐसा (यह) वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरुके घर रहें ॥ २ ॥
जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे । नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे ॥ जौं परिहास कीन्हि कछु होई । तौ कहि प्रगट जनावहु सोई ॥
जो तुम हमारे कहनेपर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकटमें कहकर जना दो [कि मैंने दिल्लगी की है] ॥ ३ ॥
राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू ॥ उठहु बेगि सोड़ करहु उपाई । जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई ॥
राम-सरीखा पुत्र क्या बनके योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपायसे इस शोक और कलङ्कका नाश हो ॥ ४ ॥
छं०—जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही । हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही ॥ जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जाभिनी । तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भाभिनी ॥
३८६
- रामचरितमानस *
जिस तरह [नगरभरका] शोक और [तुम्हारा] कलङ्ग मिटे, वही उपाय करके कुलकी रक्षा कर। वन जाते हुए श्रीरामजीको हट करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं—जैसे सूर्यके बिना दिन, प्राणके बिना शरीर और चन्द्रमाके बिना रात [निजीव तथा शोभाहीन हो जाती है], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्या हो जायगी; हे भाभिनी! तू अपने हृदयमें इस बातको समझ (विचारकर देख) तो सही।
सो०—सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।
तेईं कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी ॥ ५० ॥
इस प्रकार सखियोंने ऐसी सीख दी जो सुननेमें मीठी और परिणाममें हितकारी थी। पर कुटिला कूबरीकी सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयीने इसपर जरा भी कान नहीं दिया ॥ ५० ॥
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी । मूगिन्ह चितव जनु बाधिनि भूखी ॥ व्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी । चलीं कहत मतिमंद अभागी ॥
कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोधके मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाधिन हरिनियोंको देख रही हो। तब सखियोंने रोगको असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मन्दबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं ॥ १ ॥
राजु करत यह दैअँ बिगोई । कीन्हेसि अस जस करइ न कोई ॥ एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं । देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं ॥
राज्य करते हुए इस कैकेयीको दैवने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगरके सब स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयीको करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं ॥ २ ॥
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा । कवनि राम बिनु जीवन आसा ॥ बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी । जनु जलचर गन सूखत पानी ॥
लोग विषमज्वर (भयानक दुःखकी आग) से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीनेकी कौन आशा है। महान् वियोग [की आशंका] से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखनेके समय जलचर जीवोंका समुदाय व्याकुल हो! ॥ ३ ॥
अति बिषाद बस लोग लोगाई । गए मातु पहिं रामु गोसाई ॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ । मिटा सोचु जनि राखै राऊ ॥
सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषादके वश हो रहे हैं। स्वामी श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्याके पास गये। उनका मुख प्रसन्न है और चितमें चौगुना चाव (उत्साह) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें। [श्रीरामजीको राजतिलककी बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयोंको छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयीकी आज्ञा और पिताकी मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।] ॥ ४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
३८७
दो०—नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।
छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान ॥ ५१ ॥
श्रीरामचन्द्रजीका मन नये पकड़े हुए हाथीके समान और राजतिलक उस हाथीके बाँधनेकी काँटेदार लोहेकी बेड़ीके समान है। 'वन जाना है' यह सुनकर, अपनेको बन्धनसे छूटा जानकर, उनके हृदयमें आनन्द बढ़ गया है ॥ ५१ ॥
रघुकुल तिलक जोरि दोउ हाथा । मुदित मातु पद नायउ माथा ॥
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे । भूषन बसन निछावरि कीन्हे ॥
रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीने दोनों हाथ जोड़कर आनन्दके साथ माताके चरणोंमें सिर नवाया। माताने आशीर्वाद दिया, अपने हृदयसे लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये ॥ १ ॥
बार बार मुख चुंबति माता । नयन नेह जलु पुलकित गाता ॥
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए । स्वरत प्रेमरस पयद सुहाए ॥
माता बार-बार श्रीरामचन्द्रजीका मुख चूम रही हैं। नेत्रोंमें प्रेमका जल भर आया है और सब अङ्ग पुलकित हो गये हैं। श्रीरामको अपनी गोदमें बैठाकर फिर हृदयसे लगा लिया। सुन्दर स्तन प्रेमरस (दूध) बहाने लगे ॥ २ ॥
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई । रंक धनद पदबी जनु पाई ॥
सादर सुंदर बदनु निहारी । बोली मधुर बचन महतारी ॥
उनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगालने कुबेरका पद पा लिया हो। बड़े आदरके साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं— ॥ ३ ॥
कहहु तात जननी बलिहारी । कबहिं लगन मुद मंगलकारी ॥
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई । जनम लाभ कइ अवधि अघाई ॥
हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द-मङ्गलकारी लगन कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुखकी सुन्दर सीमा है और जन्म लेनेके लाभकी पूर्णतम अवधि है; ॥ ४ ॥
दो०—जैहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति ॥ ५२ ॥
तथा जिस (लगन) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यन्त व्याकुलतासे इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्याससे चातक और चातकी शरद-ऋतुके स्वातिनक्षत्रकी वर्षाको चाहते हैं ॥ ५२ ॥
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू । जो मन भाव मधुर कछु खाहू ॥
पितु समीप तब जाएहु भैआ । भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ ॥
३८८
- रामचरितमानस *
हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिताके पास जाना। बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है॥१॥
मातु बचन सुनि अति अनुकूला । जनु सनेह सुरतरु के फूला॥ सुख मकरंद भरे श्रियमूला । निरखि राम मनु भवरु न भूला॥
माताके अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर—जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्षके फूल थे, जो सुखरूपी मकरन्द (पुष्परस) से भरे थे और श्री (राजलक्ष्मी) के मूल थे—ऐसे वचनरूपी फूलोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मनरूपी भौरा उनपर नहीं भूला॥२॥
धरम धुरीन धरम गति जानी । कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥ पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू । जहाँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥
धर्मधुरीण श्रीरामचन्द्रजीने धर्मकी गतिको जानकर मातासे अत्यन्त कोमल वाणीसे कहा—हे माता! पिताजीने मुझको वनका राज्य दिया है, जहाँ सब प्रकारसे मेरा बड़ा काम बननेवाला है॥३॥
आयसु देहि मुदित मन माता । जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥ जनि सनेह बस डरपसि भोरें । आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥
हे माता! तू प्रसन्न मनसे मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रामें आनन्द-मङ्गल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपासे आनन्द ही होगा॥४॥
दो०—बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान ।
आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥५३॥
चौदह वर्ष वनमें रहकर, पिताजीके वचनको प्रमाणित (सत्य) कर, फिर लौटकर तेरे चरणोंका दर्शन करूँगा; तू मनको म्लान (दुःखी) न कर॥५३॥
बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके॥ सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी । जिमि जवास परें पावस पानी॥
रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीके ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माताके हृदयमें बाणके समान लगे और कसकने लगे। उस शीतल वाणीको सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गयीं जैसे बरसातका पानी पड़नेसे जवासा सूख जाता है॥१॥
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥ नयन सजल तन थर थर काँपी । माजहि खाइ मीन जनु मापी॥
हृदयका विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रोंमें जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। मानो मछली माँजा (पहली वर्षाका फेन) खाकर बदहवास हो गयी हो!॥२॥