भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

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  • रामचरितमानस *

[उन्होंने फिर कहा—] इस पृथ्वीतलपर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिताको परम आनन्द हो। जिसको माता-पिता प्राणोंके समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उसके करतलगत (मुट्टीमें) रहते हैं ॥ १ ॥

आयसु पालि जनम फलु पाई । ऐहउँ बेगिहिं होउ रजार्ई ॥ बिदा मातु सन आवउँ मागी । चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी ॥

आपकी आज्ञा पालन करके और जन्मका फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अतः कृपया आज्ञा दीजिये। मातासे विदा माँग आता हूँ। फिर आपके पैर लगकर (प्रणाम करके) वनको चल्तूँगा ॥ २ ॥

अस कहि राम गवनु तब कीन्हा । भूप सोक बस उतरु न दीन्हा ॥ नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी । छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी ॥

ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहाँसे चल दिये। राजाने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी (अप्रिय) बात नगरभरमें इतनी जल्दी फैल गयी मानो डंक मारते ही बिच्छूका विष सारे शरीरमें चढ़ गया हो ॥ ३ ॥

सुनि भए बिकल सकल नर नारी । बेलि बिटप जिमि देखि दवारी ॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई । बड़ विषादु नहिं धीरजु होई ॥

इस बातको सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल (वनमें आग लगी) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने (पीटने) लगता है! बड़ा विषाद है, किसीको धीरज नहीं बँधता ॥ ४ ॥

दो०—मुख सुखाहिं लोचन स्वरहिं सोकु न हृदयँ समाइ । मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ ॥ ४६ ॥

सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखोंसे आँसू बहते हैं, शोक हृदयमें नहीं समाता। मानो करुणारसकी सेना अवधपर डंका बजाकर उत्तर आयी हो ॥ ४६ ॥

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी । जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी ॥ एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ । छाइ भवन पर पावकु धरेऊ ॥

सब मेल मिल गये थे (सब संयोग ठीक हो गये थे), इतनेमें ही विधाताने बात बिगाड़ दी! जहाँ-तहाँ लोग कैकेयीको गाली दे रहे हैं! इस पापिनको क्या सूझ पड़ा जो इसने छाये घरपर आग रख दी ॥ १ ॥

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा । डारि सुधा बिषु चाहत चीखा ॥ कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी । भइ रघुबंस बेनु बन आगी ॥