भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 385
  • अयोध्याकाण्ड *

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यह अपने हाथसे अपनी आँखोंको निकालकर (आँखोंके बिना ही) देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंशरूपी बाँसके बनके लिये अग्नि हो गयी!! २ ॥

पालव बैठि पेड़ एहिं काटा । सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा ॥ सदा रामु एहि प्रान समाना । कारन कवन कुटिलपनु ठाना ॥

पतेपर बैठकर इसने पेड़को काट डाला। सुखमें शोकका टाट ठटकर रख दिया! श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणोंके समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी ॥ ३ ॥

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ । सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ ॥ निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ॥

कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्रीका स्वभाव सब प्रकारसे पकड़में आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाय, पर भाई! स्त्रियोंकी गति (चाल) नहीं जानी जाती ॥ ४ ॥

दो०—काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।

का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥ ४७ ॥

आग क्या नहीं जला सकती! समुद्रमें क्या नहीं समा सकता! अबला कहनेवाली प्रबल स्त्री [जाति] क्या नहीं कर सकती! और जगत्में काल किसको नहीं खाता!! ४७ ॥

का सुनाइ बिधि काह सुनावा । का देखाइ चह काह देखावा ॥ एक कहहिं भल भूप न कीन्हा । बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा ॥

विधाताने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजाने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयीको विचारकर वर नहीं दिया, ॥ १ ॥

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु । अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु ॥ एक धरम परमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने ॥

जो हठ करके (कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखोंके पात्र हो गये। स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते ॥ २ ॥

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी । एक एक सन कहहिं बखानी ॥ एक भरत कर संमत कहहीं । एक उदास भायँ सुनि रहहीं ॥

वे शिबि, दधीचि और हरिश्रन्द्रकी कथा एक दूसरेसे बखानकर कहते हैं। कोई एक इसमें भरतजीकी सम्मति बताते हैं। कोई एक सुनकर उदासीनभावसे रह जाते हैं (कुछ बोलते नहीं) ॥ ३ ॥