भारतकोश
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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • अयोध्याकाण्ड *

३८३

यह अपने हाथसे अपनी आँखोंको निकालकर (आँखोंके बिना ही) देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंशरूपी बाँसके बनके लिये अग्नि हो गयी!! २ ॥

पालव बैठि पेड़ एहिं काटा । सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा ॥ सदा रामु एहि प्रान समाना । कारन कवन कुटिलपनु ठाना ॥

पतेपर बैठकर इसने पेड़को काट डाला। सुखमें शोकका टाट ठटकर रख दिया! श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणोंके समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी ॥ ३ ॥

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ । सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ ॥ निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ॥

कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्रीका स्वभाव सब प्रकारसे पकड़में आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाय, पर भाई! स्त्रियोंकी गति (चाल) नहीं जानी जाती ॥ ४ ॥

दो०—काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।

का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥ ४७ ॥

आग क्या नहीं जला सकती! समुद्रमें क्या नहीं समा सकता! अबला कहनेवाली प्रबल स्त्री [जाति] क्या नहीं कर सकती! और जगत्में काल किसको नहीं खाता!! ४७ ॥

का सुनाइ बिधि काह सुनावा । का देखाइ चह काह देखावा ॥ एक कहहिं भल भूप न कीन्हा । बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा ॥

विधाताने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजाने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयीको विचारकर वर नहीं दिया, ॥ १ ॥

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु । अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु ॥ एक धरम परमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने ॥

जो हठ करके (कैकेयीकी बातको पूरा करनेमें अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखोंके पात्र हो गये। स्त्रीके विशेष वश होनेके कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो धर्मकी मर्यादाको जानते हैं और सयाने हैं, वे राजाको दोष नहीं देते ॥ २ ॥

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी । एक एक सन कहहिं बखानी ॥ एक भरत कर संमत कहहीं । एक उदास भायँ सुनि रहहीं ॥

वे शिबि, दधीचि और हरिश्रन्द्रकी कथा एक दूसरेसे बखानकर कहते हैं। कोई एक इसमें भरतजीकी सम्मति बताते हैं। कोई एक सुनकर उदासीनभावसे रह जाते हैं (कुछ बोलते नहीं) ॥ ३ ॥

३८४

  • रामचरितमानस *

कान मूँदि कर रद गहि जीहा । एक कहहिं यह बात अलीहा ॥ सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे । रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे ॥

कोई हाथोंसे कान मूँदकर और जीभको दाँतोंतले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहनेसे तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जायेंगे। भरतजीको तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणोंके समान प्यारे हैं ॥ ४ ॥

दो०—चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल ।

सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल ॥ ४८ ॥

चन्द्रमा चाहे [शीतल किरणोंकी जगह] आगकी चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विषके समान हो जाय, परन्तु भरतजी स्वप्नमें भी कभी श्रीरामचन्द्रजीके विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे ॥ ४८ ॥

एक बिधातहि दूषनु देहीं । सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं ॥

खरभरु नगर सोचु सब काहू । दुसह दाहु उर मिटा उछाहू ॥

कोई एक विधाताको दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगरभरमें खलबली मच गयी, सब किसीको सोच हो गया। हृदयमें दुःसह जलन हो गयी, आनन्द-उत्साह मिट गया ॥ १ ॥

बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी । जे प्रिय परम कैकई केरी ॥

लगीं देन सिख सीलु सराही । बचन बानसम लागहिं ताही ॥

ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ, कुलकी माननीय बड़ी-बूढ़ी और जो कैकेयीकी परम प्रिय थीं, वे उसके शीलकी सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाणके समान लगते हैं ॥ २ ॥

भरतु न मोहि प्रिय राम समाना । सदा कहहु यहु सबु जगु जाना ॥

करहु राम पर सहज सनेहू । केहिं अपराध आजु बनु देहू ॥

[वे कहती हैं—] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्रके समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं; इस बातको सारा जगत् जानता है। श्रीरामचन्द्रजीपर तो तुम स्वाभाविक ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराधसे उन्हें वन देती हो? ॥ ३ ॥

कबहुँ न कियहु सवति आरेसू । प्रीति प्रतीति जान सबु देसू ॥

कौसल्याँ अब काह बिगारा । तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा ॥

तुमने कभी सौतियाडाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वासको जानता है। अब कौसल्याने तुम्हारा कौन-सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगरपर वज्र गिरा दिया ॥ ४ ॥

दो०—सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहिं धाम ।

राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम ॥ ४९ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३८५

क्या सीताजी अपने पति (श्रीरामचन्द्रजी)-का साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना घर रह सकेंगे? क्या भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यापुरीका राज्य भोग सकेंगे? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीवित रह सकेंगे? (अर्थात् न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा) ॥ ४९ ॥

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू । सोक कलंक कोठि जनि होहू ॥ भरतहि अवसि देहु जुबराजू । कानन काह राम कर काजू ॥

हृदयमें ऐसा विचारकर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलङ्क की कोठी मत बनो। भरतको अवश्य युवराजपद दो, पर श्रीरामचन्द्रजीका वनमें क्या काम है! ॥ १ ॥

नाहिन रामु राज के भूखे । धरम धुरीन बिषय रस रूखे ॥ गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू । नृप सन अस बरु दूसर लेहू ॥

श्रीरामचन्द्रजी राज्यके भूखे नहीं हैं। वे धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले और विषय-रससे रूखे हैं (अर्थात् उनमें विषयासक्ति है ही नहीं)। [इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्रीरामजी वन न गये तो भरतके राज्यमें विघ्न करेंगे; इतनेपर भी मन न माने तो] तुम राजासे दूसरा ऐसा (यह) वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरुके घर रहें ॥ २ ॥

जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे । नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे ॥ जौं परिहास कीन्हि कछु होई । तौ कहि प्रगट जनावहु सोई ॥

जो तुम हमारे कहनेपर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकटमें कहकर जना दो [कि मैंने दिल्लगी की है] ॥ ३ ॥

राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू ॥ उठहु बेगि सोड़ करहु उपाई । जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई ॥

राम-सरीखा पुत्र क्या बनके योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपायसे इस शोक और कलङ्कका नाश हो ॥ ४ ॥

छं०—जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही । हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही ॥ जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जाभिनी । तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भाभिनी ॥

३८६

  • रामचरितमानस *

जिस तरह [नगरभरका] शोक और [तुम्हारा] कलङ्ग मिटे, वही उपाय करके कुलकी रक्षा कर। वन जाते हुए श्रीरामजीको हट करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं—जैसे सूर्यके बिना दिन, प्राणके बिना शरीर और चन्द्रमाके बिना रात [निजीव तथा शोभाहीन हो जाती है], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्या हो जायगी; हे भाभिनी! तू अपने हृदयमें इस बातको समझ (विचारकर देख) तो सही।

सो०—सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।

तेईं कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी ॥ ५० ॥

इस प्रकार सखियोंने ऐसी सीख दी जो सुननेमें मीठी और परिणाममें हितकारी थी। पर कुटिला कूबरीकी सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयीने इसपर जरा भी कान नहीं दिया ॥ ५० ॥

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी । मूगिन्ह चितव जनु बाधिनि भूखी ॥ व्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी । चलीं कहत मतिमंद अभागी ॥

कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोधके मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाधिन हरिनियोंको देख रही हो। तब सखियोंने रोगको असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मन्दबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं ॥ १ ॥

राजु करत यह दैअँ बिगोई । कीन्हेसि अस जस करइ न कोई ॥ एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं । देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं ॥

राज्य करते हुए इस कैकेयीको दैवने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगरके सब स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयीको करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं ॥ २ ॥

जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा । कवनि राम बिनु जीवन आसा ॥ बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी । जनु जलचर गन सूखत पानी ॥

लोग विषमज्वर (भयानक दुःखकी आग) से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीनेकी कौन आशा है। महान् वियोग [की आशंका] से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखनेके समय जलचर जीवोंका समुदाय व्याकुल हो! ॥ ३ ॥

अति बिषाद बस लोग लोगाई । गए मातु पहिं रामु गोसाई ॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ । मिटा सोचु जनि राखै राऊ ॥

सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषादके वश हो रहे हैं। स्वामी श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्याके पास गये। उनका मुख प्रसन्न है और चितमें चौगुना चाव (उत्साह) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें। [श्रीरामजीको राजतिलककी बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयोंको छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयीकी आज्ञा और पिताकी मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।] ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३८७

दो०—नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।

छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान ॥ ५१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका मन नये पकड़े हुए हाथीके समान और राजतिलक उस हाथीके बाँधनेकी काँटेदार लोहेकी बेड़ीके समान है। 'वन जाना है' यह सुनकर, अपनेको बन्धनसे छूटा जानकर, उनके हृदयमें आनन्द बढ़ गया है ॥ ५१ ॥

रघुकुल तिलक जोरि दोउ हाथा । मुदित मातु पद नायउ माथा ॥

दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे । भूषन बसन निछावरि कीन्हे ॥

रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीने दोनों हाथ जोड़कर आनन्दके साथ माताके चरणोंमें सिर नवाया। माताने आशीर्वाद दिया, अपने हृदयसे लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये ॥ १ ॥

बार बार मुख चुंबति माता । नयन नेह जलु पुलकित गाता ॥

गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए । स्वरत प्रेमरस पयद सुहाए ॥

माता बार-बार श्रीरामचन्द्रजीका मुख चूम रही हैं। नेत्रोंमें प्रेमका जल भर आया है और सब अङ्ग पुलकित हो गये हैं। श्रीरामको अपनी गोदमें बैठाकर फिर हृदयसे लगा लिया। सुन्दर स्तन प्रेमरस (दूध) बहाने लगे ॥ २ ॥

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई । रंक धनद पदबी जनु पाई ॥

सादर सुंदर बदनु निहारी । बोली मधुर बचन महतारी ॥

उनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगालने कुबेरका पद पा लिया हो। बड़े आदरके साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं— ॥ ३ ॥

कहहु तात जननी बलिहारी । कबहिं लगन मुद मंगलकारी ॥

सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई । जनम लाभ कइ अवधि अघाई ॥

हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द-मङ्गलकारी लगन कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुखकी सुन्दर सीमा है और जन्म लेनेके लाभकी पूर्णतम अवधि है; ॥ ४ ॥

दो०—जैहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।

जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति ॥ ५२ ॥

तथा जिस (लगन) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यन्त व्याकुलतासे इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्याससे चातक और चातकी शरद-ऋतुके स्वातिनक्षत्रकी वर्षाको चाहते हैं ॥ ५२ ॥

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू । जो मन भाव मधुर कछु खाहू ॥

पितु समीप तब जाएहु भैआ । भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ ॥

३८८

  • रामचरितमानस *

हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिताके पास जाना। बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है॥१॥

मातु बचन सुनि अति अनुकूला । जनु सनेह सुरतरु के फूला॥ सुख मकरंद भरे श्रियमूला । निरखि राम मनु भवरु न भूला॥

माताके अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर—जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्षके फूल थे, जो सुखरूपी मकरन्द (पुष्परस) से भरे थे और श्री (राजलक्ष्मी) के मूल थे—ऐसे वचनरूपी फूलोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मनरूपी भौरा उनपर नहीं भूला॥२॥

धरम धुरीन धरम गति जानी । कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥ पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू । जहाँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥

धर्मधुरीण श्रीरामचन्द्रजीने धर्मकी गतिको जानकर मातासे अत्यन्त कोमल वाणीसे कहा—हे माता! पिताजीने मुझको वनका राज्य दिया है, जहाँ सब प्रकारसे मेरा बड़ा काम बननेवाला है॥३॥

आयसु देहि मुदित मन माता । जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥ जनि सनेह बस डरपसि भोरें । आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥

हे माता! तू प्रसन्न मनसे मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रामें आनन्द-मङ्गल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपासे आनन्द ही होगा॥४॥

दो०—बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान ।

आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥५३॥

चौदह वर्ष वनमें रहकर, पिताजीके वचनको प्रमाणित (सत्य) कर, फिर लौटकर तेरे चरणोंका दर्शन करूँगा; तू मनको म्लान (दुःखी) न कर॥५३॥

बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके॥ सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी । जिमि जवास परें पावस पानी॥

रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीके ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माताके हृदयमें बाणके समान लगे और कसकने लगे। उस शीतल वाणीको सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गयीं जैसे बरसातका पानी पड़नेसे जवासा सूख जाता है॥१॥

कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥ नयन सजल तन थर थर काँपी । माजहि खाइ मीन जनु मापी॥

हृदयका विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रोंमें जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। मानो मछली माँजा (पहली वर्षाका फेन) खाकर बदहवास हो गयी हो!॥२॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३८९

धरि धीरजु सुत बदनु निहारी । गदगद बचन कहति महतारी ॥ तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे । देखि मुदित नित चरित तुम्हारे ॥

धीरज धरकर, पुत्रका मुख देखकर माता गदगद वचन कहने लगीं—हे तात! तुम तो पिताको प्राणोंके समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रोंको देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे ॥ ३ ॥

राजु देन कहँ सुभ दिन साधा । कहेउ जान बन केहिँ अपराधा ॥ तात सुनावहु मोहि निदानू । को दिनकर कुल भयउ कृसानू ॥

राज्य देनेके लिये उन्होंने ही शुभ दिन सोधवाया था। फिर अब किस अपराधसे बन जानेको कहा? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ! सूर्यवंश [रूपी वन] को जलानेके लिये अग्नि कौन हो गया? ॥ ४ ॥

दो०—निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ । सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ ॥ ५४ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर मन्त्रीके पुत्रने सब कारण समझाकर कहा। उस प्रसंगको सुनकर वे गूँगी-जैसी (चुप) रह गयीं, उनकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५४ ॥

राखि न सकइ न कहि सक जाहू । दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू ॥ लिखत सुधाकर गा लिखि राहू । बिधि गति बाम सदा सब काहू ॥

न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही प्रकारसे हृदयमें बड़ा भारी सन्ताप हो रहा है। [मनमें सोचती हैं कि देखो—] विधाताकी चाल सदा सबके लिये टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया राहु! ॥ १ ॥

धरम सनेह उभयँ मति घेरी । भइ गति साँप छुछुंदरि केरी ॥ राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू । धरमु जाइ अरु बंधु विरोधू ॥

धर्म और स्नेह दोनोंने कौसल्याजीकी बुद्धिको घेर लिया। उनकी दशा साँप-छछुंदरकी-सी हो गयी। वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध (हठ) करके पुत्रको रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयोंमें विरोध होता है; ॥ २ ॥

कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी । संकट सोच बिबस भइ रानी ॥ बहरि समुझि तिय धरमु सयानी । रामु भरतु दोउ सुत सम जानी ॥

और यदि वन जानेको कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकारके धर्म-संकटमें पड़कर रानी विशेषरूपसे सोचके वश हो गयीं। फिर बुद्धिमती कौसल्याजी स्त्री-धर्म (पातिव्रत-धर्म) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रोंको समान जानकर— ॥ ३ ॥

३९०

  • रामचरितमानस *

सरल सुभाउ राम महतारी । बोली बचन धीर धरि भारी ॥ तात जाऊँ बलि कीन्हेहु नीका । पितु आयसु सब धरमक टीका ॥

सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजीकी माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोली—हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया। पिताकी आज्ञाका पालन करना ही सब धर्मोंका शिरोमणि धर्म है ॥ ४ ॥

दो०—राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु ।

तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु ॥ ५५ ॥

राज्य देनेको कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दुःख नहीं है। [दुःख तो इस बातका है कि] तुम्हारे बिना भरतको, महाराजको और प्रजाको बड़ा भारी क्लेश होगा ॥ ५५ ॥

जौं केवल पितु आयसु ताता । तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ॥

जौं पितु मातु कहेउ बन जाना । तौ कानन सत अवध समाना ॥

हे तात! यदि केवल पिताजीकी ही आज्ञा हो, तो माताको [पितासे] बड़ी जानकर वनको मत जाओ। किन्तु यदि पिता-माता दोनोंने वन जानेको कहा हो, तो वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याके समान है ॥ १ ॥

पितु बनदेव मातु बनदेवी । खग मृग चरन सरोरुह सेवी ॥

अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू । बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू ॥

वनके देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियों माता होंगी। वहाँके पशु-पक्षी तुम्हारे चरण-कमलोंके सेवक होंगे। राजाके लिये अन्तमें तो वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी [सुकुमार] अवस्था देखकर हृदयमें दुःख होता है ॥ २ ॥

बड़भागी बनु अवध अभागी । जो रघुवंसतिलक तुम्ह त्यागी ॥

जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू । तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू ॥

हे रघुवंशके तिलक! वन बड़ा भाग्यवान् है और यह अवध अभागी है, जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदयमें सन्देह होगा [कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं] ॥ ३ ॥

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के । प्रान प्रान के जीवन जी के ॥

ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ । मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ ॥

हे पुत्र! तुम सभीके परम प्रिय हो। प्राणोंके प्राण और हृदयके जीवन हो। वही (प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता! मैं वनको जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनोंको सुनकर बैठी पछताती हूँ! ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३११

दो०—यह बिचारि नहीं करउँ हठ झूठ सनेहु बढाइ।

मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ ॥ ५६ ॥

यह सोचकर झूठा स्नेह बढाकर मैं हठ नहीं करती। बेटा! मैं बलैया लेती हूँ, माताका नाता मानकर मेरी सुध भूल न जाना ॥ ५६ ॥

देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं। राखहुँ पलक नयन की नाईं ॥

अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना ॥

हे गोसाईं! सब देव और पितर तुम्हारी वैसे ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखोंकी रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवासकी अवधि (चौदह वर्ष) जल है, प्रियजन और कुटुम्बी मछली हैं। तुम दयाकी खान और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो ॥ १ ॥

अस बिचारि सोइ करहु उपाईं। सबहि जित जेहिं भेंटहु आईं ॥

जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ ॥

ऐसा विचारकर वही उपाय करना जिसमें सबके जीते-जी तुम आ मिलो। मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम सेवकों, परिवारवालों और नगरभरको अनाथ करके सुखपूर्वक वनको जाओ ॥ २ ॥

सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता ॥

बहुबिधि बिलिपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी ॥

आज सबके पुण्योंका फल पूरा हो गया! कठिन काल हमारे विपरीत हो गया। [इस प्रकार] बहुत विलाप करके और अपनेको परम अभागिनी जानकर माता श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें लिपट गयीं ॥ ३ ॥

दारुन दुसह दाहु उर व्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा ॥

राम उठाइ मातु उर लाईं। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाईं ॥

हृदयमें भयानक दुःसह संताप छा गया। उस समयके बहुविध विलापका वर्णन नहीं किया जा सकता। श्रीरामचन्द्रजीने माताको उठाकर हृदयसे लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया ॥ ४ ॥

दो०—समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।

जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ ॥ ५७ ॥

उसी समय यह समाचार सुनकर सीताजी अकुला उठीं और सासके पास जाकर उनके दोनों चरणकमलोंकी वन्दना कर सिर नीचा करके बैठ गयीं ॥ ५७ ॥

३१२

  • रामचरितमानस *

दीन्हि असीस सासु मृदु बानी । अति सुकुमारि देखि अकुलानी ॥ बैठि नमितमुख सोचति सीता । रूप रासि पति प्रेम पुनीता ॥

सासने कोमल वाणीसे आशीर्वाद दिया। वे सीताजीको अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं। रूपकी राशि और पतिके साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नीचा मुख किये बैठी सोच रही हैं ॥ १ ॥

चलन चहत बन जीवननाथू । केहि सुकृती सन होइहि साथू ॥ की तनु प्रान कि केवल प्राना । बिधि करतबु कछु जाइ न जाना ॥

जीवननाथ (प्राणनाथ) वनको चलना चाहते हैं। देखें किस पुण्यवान्से उनका साथ होगा—शरीर और प्राण दोनों साथ जायेंगे या केवल प्राणहीसे इनका साथ होगा? विधाताकी करनी कुछ जानी नहीं जाती ॥ २ ॥

चारु चरन नख लेखति धरनी । नूपुर मुखर मधुर कवि बरनी ॥ मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं । हमहि सीय पद जनि परिहरहीं ॥

सीताजी अपने सुन्दर चरणोंके नखोंसे धरती कुरेद रही हैं। ऐसा करते समय नूपुरोंका जो मधुर शब्द हो रहा है, कवि उसका इस प्रकार वर्णन करते हैं कि मानो प्रेमके वश होकर नूपुर यह बिनती कर रहे हैं कि सीताजीके चरण कभी हमारा त्याग न करें ॥ ३ ॥

मंजु बिलोचन मोचति बारी । बोली देखि राम महतारी ॥ तात सुनहु सिय अति सुकुमारी । सास ससुर परिजनहि पिआरी ॥

सीताजी सुन्दर नेत्रोंसे जल बहा रही हैं। उनकी यह दशा देखकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी बोलीं—हे तात! सुनो, सीता अत्यन्त ही सुकुमारी हैं तथा सास, ससुर और कुटुम्बी सभीको प्यारी हैं ॥ ४ ॥

दो०—पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु ॥ ५८ ॥

इनके पिता जनकजी राजाओंके शिरोमणि हैं; ससुर सूर्यकुलके सूर्य हैं और पति सूर्यकुलरूपी कुमुदवनको खिलानेवाले चन्द्रमा तथा गुण और रूपके भण्डार हैं ॥ ५८ ॥

मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई । रूप रासि गुन सील सुहाई ॥ नयन पुतारि करि प्रीति बढ़ाई । राखेउँ प्रान जानकिहँ लाई ॥

फिर मैंने रूपकी राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रबधू पायी है। मैंने इन (जानकी)को आँखोंकी पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं ॥ १ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३१३

कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली । सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली ॥ फूलत फलत भयउ बिधि बामा । जानि न जाइ काह परिनामा ॥

इन्हें कल्पलताके समान मैंने बहुत तरहसे बड़े लाड़-चावके साथ स्नेहरूपी जलसे सींचकर पाला है। अब इस लताके फूलने-फलनेके समय विधाता वाम हो गये। कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा ॥ २ ॥

पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा । सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा ॥ जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ । दीप बाति नहिं टारन कहऊँ ॥

सीताने पर्यङ्कपृष्ठ (पलंगके ऊपर), गोद और हिंडोलेको छोड़कर कठोर पृथ्वीपर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा सञ्जीवनी जड़ीके समान [सावधानीसे] इनकी रखवाली करती रही हूँ। कभी दीपककी बत्ती हटानेको भी नहीं कहती ॥ ३ ॥

सोइ सिय चलन चहति बन साथा । आयसु काह होइ रघुनाथा ॥ चंद किरन रस रसिक चकोरी । रबि रुख नयन सकड़ किमि जोरी ॥

वही सीता अब तुम्हारे साथ बन चलना चाहती है। हे रघुनाथ! उसे क्या आज्ञा होती है? चन्द्रमाकी किरणोंका रस (अमृत) चाहनेवाली चकोरी सूर्यकी ओर आँख किस तरह मिला सकती है ॥ ४ ॥

दो०—करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।

विष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि ॥ ५९ ॥

हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव-जन्तु वनमें विचरते रहते हैं। हे पुत्र! क्या विषकी वाटिकामें सुन्दर सञ्जीवनी बूटी शोभा पा सकती है? ॥ ५९ ॥

बन हित कोल किरात किसोरी । रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी ॥

पाहनकृमि जिमि कठिन सुभाऊ । तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ ॥

वनके लिये तो ब्रह्माजीने विषयसुखको न जाननेवाली कोल और भीलोंकी लड़कियोंको रचा है, जिनका पत्थरके कीड़े-जैसा कठोर स्वभाव है। उन्हें वनमें कभी क्लेश नहीं होता ॥ १ ॥

कै तापस तिय कानन जोगू । जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू ॥

सिय बन बसिहि तात केहि भाँती । चित्रलिखित कपि देखि डेराती ॥

अथवा तपस्वियोंकी स्त्रियाँ वनमें रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्याके लिये सब भोग तज दिये हैं। हे पुत्र! जो तसवीरके बन्दरको देखकर डर जाती हैं वे सीता वनमें किस तरह रह सकेंगी? ॥ २ ॥

सुरसर सुभग बनज बन चारी । डाबर जोगु कि हंसकुमारी ॥

अस बिचारि जस आयसु होई । मैं सिख देउँ जानकिहि सोई ॥

३१४

  • रामचरितमानस *

देवसरोवरके कमलवनमें विचरण करनेवाली हंसिनी क्या गड़ियों (तलैयाँ) में रहनेके योग्य है ? ऐसा विचारकर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकीको वैसी ही शिक्षा दूँ ॥ ३ ॥

जों सिय भवन रहै कह अंबा । मोहि कहैं होइ बहुत अवलंबा ॥ सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी । सील सनेह सुधाँ जनु सानी ॥

माता कहती हैं—यदि सीता घरमें रहें तो मुझको बहुत सहारा हो जाय। श्रीरामचन्द्रजीने माताकी प्रिय वाणी सुनकर, जो मानो शील और स्नेहरूपी अमृतसे सनी हुई थी, ॥ ४ ॥

दो०—कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष ।

लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष ॥ ६० ॥

विवेकमय प्रिय वचन कहकर माताको सन्तुष्ट किया। फिर वनके गुण-दोष प्रकट करके वे जानकीजीको समझाने लगे ॥ ६० ॥

मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम

मातु समीप कहत सकुचाहीं । बोले समउ समुझि मन माहीं ॥ राजकुमारि सिखावनु सुनहू । आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू ॥

माताके सामने सीताजीसे कुछ कहनेमें सकुचाते हैं। पर मनमें यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले—हे राजकुमारी! मेरी सिखावन सुनो। मनमें कुछ दूसरी तरह न समझ लेना ॥ १ ॥

आपन मोर नीक जों चहहू । बचनु हमार मानि गूह रहहू ॥ आयसु मोर सासु सेवकाई । सब बिधि भामिनि भवन भलाई ॥

जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो। हे भामिनी! मेरी आज्ञाका पालन होगा, सासकी सेवा बन पड़ेगी। घर रहनेमें सभी प्रकारसे भलाई है ॥ २ ॥

एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा । सादर सासु ससुर पद पूजा ॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी । होइहि प्रेम बिकल मति भोरी ॥

आदरपूर्वक सास-ससुरके चरणोंकी पूजा (सेवा) करनेसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जब-जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेमसे व्याकुल होनेके कारण उनकी बुद्धि भोली हो जायगी (वे अपने-आपको भूल जायँगी), ॥ ३ ॥

तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी । सुंदरि समुझाएहू मृदु बानी ॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही । सुमुखि मातु हित राखउँ तोही ॥

हे सुन्दरी ! तब-तब तुम कोमल वाणीसे पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि ! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभावसे ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माताके लिये ही घरपर रखता हूँ ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३१५

दो०—गुरु श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।

हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥ ६१ ॥

[मेरी आज्ञा मानकर घरपर रहनेसे] गुरु और वेदके द्वारा सम्मत धर्म [के आवरण] का फल तुम्हें बिना ही क्लेशके मिल जाता है। किन्तु हठके वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे॥ ६१ ॥

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी । बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥

दिवस जात नहिं लागिहि बारा । सुंदरि सिख्वनु सुनहु हमारा॥

हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो, मैं भी पिताके वचनको सत्य करके शीघ्र ही लौटूंगा। दिन जाते देर नहीं लगेंगी। हे सुन्दरी! हमारी यह सीख सुनो॥ १ ॥

जौं हठ करहु प्रेम बस बामा । तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥

काननु कठिन भयंकरु भारी । घोर घामु हिम बारि बयारी॥

हे बामा! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाममें दुःख पाओगी। वन बड़ा कठिन (क्लेशदायक) और भयानक है। वहाँकी धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं॥ २ ॥

कुस कंटक मग काँकर नाना । चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥

चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे । मारग अगम भूमिधर भारे॥

रास्तेमें कुश, काँटे और बहुत-से कंकड़ हैं। उनपर बिना जूतेके पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण-कमल कोमल और सुन्दर हैं और रास्तेमें बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं॥ ३ ॥

कंदर खोह नदीं नद नारे । अगम अगाध न जाहिं निहारे॥

भालु बाघ बूक केहरि नागा । करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥

पर्वतोंकी गुफाएँ, खोह (दर्रे), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखातक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे [भयानक] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है॥ ४ ॥

दो०—भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।

ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल॥ ६२ ॥

जमीनपर सोना, पेड़ोंकी छालके वस्त्र पहनना और कन्द, मूल, फलका भोजन करना होगा। और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे? सब कुछ अपने-अपने समयके अनुकूल ही मिल सकेगा॥ ६२ ॥

नर अहार रजनीचर चरहीं । कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥

लागड़ अति पहार कर पानी । बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥

३१६

  • रामचरितमानस *

मनुष्योंको खानेवाले निशाचर (राक्षस) फिरते रहते हैं। वे करोड़ों प्रकारके कपट-रूप धारण कर लेते हैं। पहाड़का पानी बहुत ही लगता है। वनकी विपत्ति बखानी नहीं जा सकती॥ १ ॥

ब्याल कराल बिहग बन घोरा । निसिचर निकर नारि नर चोरा ॥ डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ । मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥

वनमें भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री-पुरुषोंको चुरानेवाले राक्षसोंके झुंड-के-झुंड रहते हैं। वनकी [भयंकरता] याद आनेमात्रसे धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभावसे ही डरपोक हो!॥ २ ॥

हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू । सुनि अपजसु मोहि देड़हि लोगू॥ मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली । जिअइ कि लवन पयोधि मराली ॥

हे हंसगमनी! तुम वनके योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जानेकी बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे (बुरा कहेंगे)। मानसरोवरके अमृतके समान जलसे पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्रमें जी सकती है?॥ ३ ॥

नव रसाल बन बिहरनसीला । सोह कि कोकिल बिपिन करीला ॥ रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी । चंदबदनि दुखु कानन भारी ॥

नवीन आमके वनमें विहार करनेवाली कोयल क्या करीलके जंगलमें शोभा पाती है? हे चन्द्रमुखी! हृदयमें ऐसा विचारकर तुम घरहीपर रहो। वनमें बड़ा कष्ट है॥ ४ ॥

दो०—सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि । सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥ ६३ ॥

स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है॥ ६३ ॥

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के । लोचन ललित भरे जल सिय के ॥ सीतल सिख दाहक भड़ कैसें । चकड़हि सरद चंद निसि जैसें ॥

प्रियतमके कोमल तथा मनोहर वचन सुनकर सीताजीके सुन्दर नेत्र जलसे भर गये। श्रीरामजीकी यह शीतल सीख उनको कैसी जलानेवाली हुई, जैसे चकवीको शरद-ऋतुकी चाँदनी रात होती है॥ १ ॥

उतरु न आव बिकल बैदेही । तजन चहत सुचि स्वामि सनेही ॥ बरबस रोकि बिलोचन बारी । धरि धीरजु उर अवनिकुमारी ॥

जानकीजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं। नेत्रोंके जल (औंसुओं) को जबर्दस्ती रोककर वे पृथ्वीकी कन्या सीताजी हृदयमें धीरज धरकर,॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३१७

लागि सासु पग कह कर जोरी । छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी ॥ दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई । जेहि बिधि मोर परम हित होई ॥

सासके पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं—हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठआईको क्षमा कीजिये। मुझे प्राणपतिने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो ॥ ३ ॥

मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं । पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं ॥

परन्तु मैंने मनमें समझकर देख लिया कि पतिके वियोगके समान जगत्में कोई दुःख नहीं है ॥ ४ ॥

दो०—प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान ।

तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान ॥ ६४ ॥

हे प्राणनाथ! हे दयाके धाम! हे सुन्दर! हे सुखोंके देनेवाले! हे सुजान! हे रघुकुलरूपी कुमुदके खिलावेवाले चन्द्रमा! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नरकके समान है ॥ ६४ ॥

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई । प्रिय परिवार सुहृद समुदाई ॥

सासु ससुर गुर सजन सहाई । सुत सुंदर सुशील सुखदाई ॥

माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रोंका समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन (बन्धु-बान्धव), सहायक और सुन्दर, सुशील और सुख देनेवाला पुत्र— ॥ १ ॥

जहाँ लगि नाथ नेह अरु नाते । पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते ॥

तनु धनु धामु धरनि पुर राजू । पति बिहीन सबु सोक समाजू ॥

हे नाथ! जहाँतक स्नेह और नाते हैं, पतिके बिना स्त्रीको सभी सूर्यसे भी बढ़कर तपानेवाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पतिके बिना स्त्रीके लिये यह सब शोकका समाज है ॥ २ ॥

भोग रोगसम भूषन भारू । जम जातना सरिस संसारू ॥

प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं । मो कहँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ॥

भोग रोगके समान हैं, गहने भाररूप हैं और संसार यम-यातना (नरककी पीड़ा) के समान है। हे प्राणनाथ! आपके बिना जगत्में मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है ॥ ३ ॥

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ॥

नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें । सरद बिमल बिधु बदनु निहारें ॥

जैसे बिना जीवके देह और बिना जलके नदी, वैसे ही हे नाथ! बिना पुरुषके स्त्री है। हे नाथ! आपके साथ रहकर आपका शरद-[पूर्णमा] के निर्मल चन्द्रमाके समान मुख देखनेसे मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे ॥ ४ ॥

३१८

  • रामचरितमानस *

दो०—खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल ।

नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल ॥ ६५ ॥

हे नाथ! आपके साथ पक्षी और पशु ही मेरे कुटुम्बी होंगे, वन ही नगर और वृक्षोंकी छाल ही निर्मल वस्त्र होंगे और पर्णकुटी (पत्तोंकी बनी झोंपड़ी) ही स्वर्गके समान सुखोंकी मूल होगी ॥ ६५ ॥

बनदेवी बनदेव उदारा । करिहहिं सासु ससुर सम सारा ॥ कुस किसलय साथरी सुहाई । प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई ॥

उदार हृदयके बनदेवी और बनदेवता ही सास-ससुरके समान मेरी सार-सँभार करेंगे, और कुशा और पत्तोंकी सुन्दर साथरी(बिछौना) ही प्रभुके साथ कामदेवकी मनोहर तोशकके समान होगी ॥ १ ॥

कंद मूल फल अमिअ अहारु । अवध सौध सत सरिस पहारु ॥ छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी । रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी ॥

कन्द, मूल और फल ही अमृतके समान आहार होंगे और [वनके] पहाड़ ही अयोध्याके सैकड़ों राजमहलोंके समान होंगे। क्षण-क्षणमें प्रभुके चरणकमलोंको देख-देखकर मैं ऐसी आनन्दित रहूँगी जैसी दिनमें चकवी रहती है ॥ २ ॥

बन दुख नाथ कहे बहुतेरे । भय बिषाद परिताप घनरे ॥ प्रभु बियोग लवल्लेस समाना । सब मिलि होहिं न कृपानिधाना ॥

हे नाथ! आपने वनके बहुत-से दुःख और बहुत-से भय, विषाद और सन्ताप कहे। परन्तु हे कृपानिधान! वे सब मिलकर भी प्रभु (आप) के वियोग [से होनेवाले दुःख] के लवल्लेशके समान भी नहीं हो सकते ॥ ३ ॥

अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि । लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि ॥ बिनती बहुत करौं का स्वामी । करुनामय उर अंतरजामी ॥

ऐसा जीमें जानकर, हे सुजानशिरोमणि ! आप मुझे साथ ले लीजिये, यहाँ न छोड़िये। हे स्वामी! मैं अधिक क्या विनती करूँ? आप करुणामय हैं और सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले हैं ॥ ४ ॥

दो०—राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान ।

दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान ॥ ६६ ॥

हे दीनबन्धु! हे सुन्दर! हे सुख देनेवाले! हे शील और प्रेमके भण्डार! यदि अवधि (चौदह वर्ष) तक मुझे अयोध्यामें रखते हैं तो जान लीजिये कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे ॥ ६६ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३११

मोहि मग चलत न होइहि हारी । छिनु छिनु चरन सरोज निहारी ॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं । मारग जनित सकल श्रम हरिहौं ॥

क्षण-क्षणमें आपके चरणकमलोंको देखते रहनेसे मुझे मार्ग चलनेमें थकावट न होगी । हे प्रियतम ! मैं सभी प्रकारसे आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलनेसे होनेवाली सारी थकावटको दूर कर दूँगी ॥ १ ॥

पाय परखारि बैठि तरु छाहीं । करिहुउँ बाउ मुदित मन माहीं ॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें । कहैं दुख समउ प्रानपति पेखें ॥

आपके पैर धोकर, पेड़ोंकी छायामें बैठकर, मनमें प्रसन्न होकर हवा करूँगी (पंखा झलूँगी) । पसीनेकी बूँदोंसहित श्याम शरीरको देखकर—प्राणपतिके दर्शन करते हुए दुःखके लिये मुझे अवकाश ही कहाँ रहेगा ॥ २ ॥

सम महि तून तरुपल्लव डासी । पाय पलोटिहि सब निसि दासी ॥ बार बार मूदु मूरति जोही । लागिहि तात बयारि न मोही ॥

समतल भूमिपर घास और पेड़ोंके पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबावेगी । बार-बार आपकी कोमल मूर्तिको देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी ॥ ३ ॥

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा । सिंधबधुहि जिमि ससक सिआरा ॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहि उचित तप मो कहूँ भोगू ॥

प्रभुके साथ [रहते] मेरी ओर [आँख उठाकर] देखनेवाला कौन है (अर्थात् कोई नहीं देख सकता) ! जैसे सिंहकी स्त्री (सिहनी) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते । मैं सुकुमारी हूँ और नाथ बनके योग्य हैं ? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग ? ॥ ४ ॥

दो०—ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान । तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावैँ प्रान ॥ ६७ ॥

ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय न फटा तो, हे प्रभु ! [मालूम होता है] ये पामर प्राण आपके वियोगका भीषण दुःख सहेंगे ॥ ६७ ॥

अस कहि सीय बिकल भइ भारी । बचन बियोगु न सकी सँभारी ॥ देखि दसा रघुपति जियँ जाना । हठि राखें नहिं राखिहि प्राना ॥

ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं । वे वचनके वियोगको भी न सँभाल सकीं । (अर्थात् शरीरसे वियोगकी बात तो अलग रही, वचनसे भी वियोगकी बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं) उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजीने अपने जीमें जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखनेसे ये प्राणोंको न रखेंगी ॥ १ ॥

४००

  • रामचरितमानस *

कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा । परिहरि सोचु चलहु बन साथा ॥ नहिं बिषाद कर अवसरु आजू । बेगि करहु बन गवन समाजू ॥

तब कृपालु, सूर्यकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ बनको चलो। आज विषाद करनेका अवसर नहीं है। तुरंत वनगमनकी तैयारी करो ॥ २ ॥

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई । लगे मातु पद आसिष पाई ॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई । जननी निठुर बिसरि जनि जाई ॥

श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर प्रियतमा सीताजीको समझाया। फिर माताके पैरों लगकर आशीर्वाद प्राप्त किया। [माताने कहा—] बेटा! जल्दी लौटकर प्रजाके दुःखको मिटाना और यह निठुर माता तुम्हें भूल न जाय ॥ ३ ॥

फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी । देखिहउँ नयन मनोहर जोरी ॥ सुदिन सुधरी तात कब होइहि । जननी जिअत बदन बिधु जोइहि ॥

हे विधाता! क्या मेरी दशा भी फिर पलटेगी? क्या अपने नेत्रोंसे मैं इस मनोहर जोड़ीको फिर देख पाऊँगी? हे पुत्र! वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते—जी तुम्हारा चाँद—सा मुखड़ा फिर देखेगी ॥ ४ ॥

दो०—बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात । कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात ॥ ६८ ॥

हे तात! 'वत्स' कहकर, 'लाल' कहकर, 'रघुपति' कहकर, 'रघुबर' कहकर, मैं फिर कब तुम्हें बुलाकर हृदयसे लगाऊँगी और हर्षित होकर तुम्हारे अङ्गोंको देखूँगी ॥ ६८ ॥

लखि सनेह कातरि महतारी । बचनु न आव बिकल भइ भारी ॥ राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना । समउ सनेहु न जाइ बखाना ॥

यह देखकर कि माता स्नेहके मारे अधीर हो गयी हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँहसे वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजीने अनेक प्रकारसे उन्हें समझाया। वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १ ॥

तब जानकी सासु पग लागी । सुनिअ माय मैं परम अभागी ॥ सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा । मोर मनोरथु सफल न कीन्हा ॥

तब जानकीजी सासके पाँव लगीं और बोलीं—हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करनेके समय दैवने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया ॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

४०१

तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू । करमु कठिन कछु दोसु न मोहू ॥ सुनि सिय बचन सासु अकुलानी । दसा कवनि बिधि कहौं बखानी ॥

आप क्षोभका त्याग कर दें, परंतु कृपा न छोड़ियेगा। कर्मकी गति कठिन है, मुझे भी कुछ दोष नहीं है। सीताजीके वचन सुनकर सास व्याकुल हो गयीं। उनकी दशाको मैं किस प्रकार बखानकर कहूँ! ॥ ३ ॥

बारहिं बार लाड़ उर लीन्ही । धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥ अचल होउ अहिवातु तुम्हारा । जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥

उन्होंने सीताजीको बार-बार हृदयसे लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गङ्गाजी और यमुनाजीमें जलकी धारा बहे, तबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे ॥ ४ ॥

दो०—सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।

चली नाड़ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार ॥ ६९ ॥

सीताजीको सासने अनेकों प्रकारसे आशीर्वाद और शिक्षाएँ दीं और वे (सीताजी) बड़े ही प्रेमसे बार-बार चरणकमलोंमें सिर नवाकर चलीं ॥ ६९ ॥

समाचार जब लछिमन पाए । व्याकुल बिलख बदन उठि धाए ॥ कंप पुलक तन नयन सनीरा । गहे चरन अति प्रेम अधीरा ॥

जब लक्ष्मणजीने ये समाचार पाये, तब वे व्याकुल होकर उदास-मुँह उठ दौड़े। शरीर काँप रहा है, रोमाञ्च हो रहा है, नेत्र आँसुओंसे भरे हैं। प्रेमसे अत्यन्त अधीर होकर उन्होंने श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये ॥ १ ॥

कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े । मीनु दीन जुन जल तें काढ़े ॥ सोचु हृदयै बिधि का होनिहारा । सबु सुखु सुकृतु सिरान हमारा ॥

वे कुछ कह नहीं सकते, खड़े-खड़े देख रहे हैं। [ऐसे दीन हो रहे हैं] मानो जलसे निकाले जानेपर मछली दीन हो रही हो। हृदयमें यह सोच है कि हे विधाता! क्या होनेवाला है? क्या हमारा सब सुख और पुण्य पूरा हो गया? ॥ २ ॥

मो कहुँ काह कहब रघुनाथा । रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा ॥ राम बिलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तूनु तोरें ॥

मुझको श्रीरघुनाथजी क्या कहेंगे? घरपर रखेंगे या साथ ले चलेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने भाई लक्ष्मणको हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभीसे नाता तोड़े हुए खड़े देखा ॥ ३ ॥

४०२

  • रामचरितमानस *

बोले बचनु राम नय नागर । सील सनेह सरल सुख सागर ॥ तात प्रेम बस जनि कदराहू । समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू ॥

तब नीतिमें निपुण और शील, स्नेह, सरलता और सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी वचन बोले— हे तात! परिणाममें होनेवाले आनन्दको हृदयमें समझकर तुम प्रेमवश अधीर मत होओ ॥ ४ ॥

दो०— मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ ।

लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥ ७० ॥

जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेनेका लाभ पाया है; नहीं तो जगत्में जन्म व्यर्थ ही है ॥ ७० ॥

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई । करहु मातु पितु पद सेवकाई ॥

भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं । राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं ॥

हे भाई! हृदयमें ऐसा जानकर मेरी सीख सुनो और माता-पिताके चरणोंकी सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घरपर नहीं हैं, महाराज बृद्ध हैं और उनके मनमें मेरा दुःख है ॥ १ ॥

मैं बन जाऊँ तुम्हहि लेइ साथा । होइ सबहि बिधि अवध अनाथा ॥

गुरु पितु मातु प्रजा परिवारु । सब कहँ परइ दुसह दुखु भारु ॥

इस अवस्थामें मैं तुमको साथ लेकर बन जाऊँ तो अयोध्या सभी प्रकारसे अनाथ हो जायगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभीपर दुःखका दुःसह भार आ पड़ेगा ॥ २ ॥

रहहु करहु सब कर परितोषू । नतरु तात होइहि बड़ दोषू ॥

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी । सो नृपु अवसि नरक अधिकारी ॥

अतः तुम यहीं रहो और सबका सन्तोष करते रहो। नहीं तो हे तात! बड़ा दोष होगा। जिसके राज्यमें प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरकका अधिकारी होता है ॥ ३ ॥

रहहु तात असि नीति बिचारी । सुनत लखनु भए व्याकुल भारी ॥

सिअरें बचन सूखि गए कैसें । परसत तुहिन तामरसु जैसें ॥

हे तात! ऐसी नीति विचारकर तुम घर रह जाओ। यह सुनते ही लक्ष्मणजी बहुत ही व्याकुल हो गये। इन शीतल वचनोंसे वे कैसे सूख गये, जैसे पालेके स्पर्शसे कमल सूख जाता है! ॥ ४ ॥

दो०— उत्तरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ ।

नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ ॥ ७१ ॥

प्रेमवश लक्ष्मणजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता। उन्होंने व्याकुल होकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये और कहा—हे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं; अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है? ॥ ७१ ॥