श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 396, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
देवसरोवरके कमलवनमें विचरण करनेवाली हंसिनी क्या गड़ियों (तलैयाँ) में रहनेके योग्य है ? ऐसा विचारकर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकीको वैसी ही शिक्षा दूँ ॥ ३ ॥
जों सिय भवन रहै कह अंबा । मोहि कहैं होइ बहुत अवलंबा ॥ सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी । सील सनेह सुधाँ जनु सानी ॥
माता कहती हैं—यदि सीता घरमें रहें तो मुझको बहुत सहारा हो जाय। श्रीरामचन्द्रजीने माताकी प्रिय वाणी सुनकर, जो मानो शील और स्नेहरूपी अमृतसे सनी हुई थी, ॥ ४ ॥
दो०—कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष ।
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष ॥ ६० ॥
विवेकमय प्रिय वचन कहकर माताको सन्तुष्ट किया। फिर वनके गुण-दोष प्रकट करके वे जानकीजीको समझाने लगे ॥ ६० ॥
मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम
मातु समीप कहत सकुचाहीं । बोले समउ समुझि मन माहीं ॥ राजकुमारि सिखावनु सुनहू । आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू ॥
माताके सामने सीताजीसे कुछ कहनेमें सकुचाते हैं। पर मनमें यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले—हे राजकुमारी! मेरी सिखावन सुनो। मनमें कुछ दूसरी तरह न समझ लेना ॥ १ ॥
आपन मोर नीक जों चहहू । बचनु हमार मानि गूह रहहू ॥ आयसु मोर सासु सेवकाई । सब बिधि भामिनि भवन भलाई ॥
जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो। हे भामिनी! मेरी आज्ञाका पालन होगा, सासकी सेवा बन पड़ेगी। घर रहनेमें सभी प्रकारसे भलाई है ॥ २ ॥
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा । सादर सासु ससुर पद पूजा ॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी । होइहि प्रेम बिकल मति भोरी ॥
आदरपूर्वक सास-ससुरके चरणोंकी पूजा (सेवा) करनेसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जब-जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेमसे व्याकुल होनेके कारण उनकी बुद्धि भोली हो जायगी (वे अपने-आपको भूल जायँगी), ॥ ३ ॥
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी । सुंदरि समुझाएहू मृदु बानी ॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही । सुमुखि मातु हित राखउँ तोही ॥
हे सुन्दरी ! तब-तब तुम कोमल वाणीसे पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि ! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभावसे ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माताके लिये ही घरपर रखता हूँ ॥ ४ ॥