श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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दो०—गुरु श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।
हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस॥ ६१ ॥
[मेरी आज्ञा मानकर घरपर रहनेसे] गुरु और वेदके द्वारा सम्मत धर्म [के आवरण] का फल तुम्हें बिना ही क्लेशके मिल जाता है। किन्तु हठके वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे॥ ६१ ॥
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी । बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥
दिवस जात नहिं लागिहि बारा । सुंदरि सिख्वनु सुनहु हमारा॥
हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो, मैं भी पिताके वचनको सत्य करके शीघ्र ही लौटूंगा। दिन जाते देर नहीं लगेंगी। हे सुन्दरी! हमारी यह सीख सुनो॥ १ ॥
जौं हठ करहु प्रेम बस बामा । तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥
काननु कठिन भयंकरु भारी । घोर घामु हिम बारि बयारी॥
हे बामा! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाममें दुःख पाओगी। वन बड़ा कठिन (क्लेशदायक) और भयानक है। वहाँकी धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं॥ २ ॥
कुस कंटक मग काँकर नाना । चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥
चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे । मारग अगम भूमिधर भारे॥
रास्तेमें कुश, काँटे और बहुत-से कंकड़ हैं। उनपर बिना जूतेके पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण-कमल कोमल और सुन्दर हैं और रास्तेमें बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं॥ ३ ॥
कंदर खोह नदीं नद नारे । अगम अगाध न जाहिं निहारे॥
भालु बाघ बूक केहरि नागा । करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥
पर्वतोंकी गुफाएँ, खोह (दर्रे), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखातक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे [भयानक] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है॥ ४ ॥
दो०—भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।
ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल॥ ६२ ॥
जमीनपर सोना, पेड़ोंकी छालके वस्त्र पहनना और कन्द, मूल, फलका भोजन करना होगा। और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे? सब कुछ अपने-अपने समयके अनुकूल ही मिल सकेगा॥ ६२ ॥
नर अहार रजनीचर चरहीं । कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥
लागड़ अति पहार कर पानी । बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥