श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 398, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
मनुष्योंको खानेवाले निशाचर (राक्षस) फिरते रहते हैं। वे करोड़ों प्रकारके कपट-रूप धारण कर लेते हैं। पहाड़का पानी बहुत ही लगता है। वनकी विपत्ति बखानी नहीं जा सकती॥ १ ॥
ब्याल कराल बिहग बन घोरा । निसिचर निकर नारि नर चोरा ॥ डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ । मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥
वनमें भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री-पुरुषोंको चुरानेवाले राक्षसोंके झुंड-के-झुंड रहते हैं। वनकी [भयंकरता] याद आनेमात्रसे धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभावसे ही डरपोक हो!॥ २ ॥
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू । सुनि अपजसु मोहि देड़हि लोगू॥ मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली । जिअइ कि लवन पयोधि मराली ॥
हे हंसगमनी! तुम वनके योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जानेकी बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे (बुरा कहेंगे)। मानसरोवरके अमृतके समान जलसे पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्रमें जी सकती है?॥ ३ ॥
नव रसाल बन बिहरनसीला । सोह कि कोकिल बिपिन करीला ॥ रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी । चंदबदनि दुखु कानन भारी ॥
नवीन आमके वनमें विहार करनेवाली कोयल क्या करीलके जंगलमें शोभा पाती है? हे चन्द्रमुखी! हृदयमें ऐसा विचारकर तुम घरहीपर रहो। वनमें बड़ा कष्ट है॥ ४ ॥
दो०—सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि । सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥ ६३ ॥
स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है॥ ६३ ॥
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के । लोचन ललित भरे जल सिय के ॥ सीतल सिख दाहक भड़ कैसें । चकड़हि सरद चंद निसि जैसें ॥
प्रियतमके कोमल तथा मनोहर वचन सुनकर सीताजीके सुन्दर नेत्र जलसे भर गये। श्रीरामजीकी यह शीतल सीख उनको कैसी जलानेवाली हुई, जैसे चकवीको शरद-ऋतुकी चाँदनी रात होती है॥ १ ॥
उतरु न आव बिकल बैदेही । तजन चहत सुचि स्वामि सनेही ॥ बरबस रोकि बिलोचन बारी । धरि धीरजु उर अवनिकुमारी ॥
जानकीजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं। नेत्रोंके जल (औंसुओं) को जबर्दस्ती रोककर वे पृथ्वीकी कन्या सीताजी हृदयमें धीरज धरकर,॥ २ ॥