श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 395, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
३१३
कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली । सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली ॥ फूलत फलत भयउ बिधि बामा । जानि न जाइ काह परिनामा ॥
इन्हें कल्पलताके समान मैंने बहुत तरहसे बड़े लाड़-चावके साथ स्नेहरूपी जलसे सींचकर पाला है। अब इस लताके फूलने-फलनेके समय विधाता वाम हो गये। कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा ॥ २ ॥
पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा । सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा ॥ जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ । दीप बाति नहिं टारन कहऊँ ॥
सीताने पर्यङ्कपृष्ठ (पलंगके ऊपर), गोद और हिंडोलेको छोड़कर कठोर पृथ्वीपर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा सञ्जीवनी जड़ीके समान [सावधानीसे] इनकी रखवाली करती रही हूँ। कभी दीपककी बत्ती हटानेको भी नहीं कहती ॥ ३ ॥
सोइ सिय चलन चहति बन साथा । आयसु काह होइ रघुनाथा ॥ चंद किरन रस रसिक चकोरी । रबि रुख नयन सकड़ किमि जोरी ॥
वही सीता अब तुम्हारे साथ बन चलना चाहती है। हे रघुनाथ! उसे क्या आज्ञा होती है? चन्द्रमाकी किरणोंका रस (अमृत) चाहनेवाली चकोरी सूर्यकी ओर आँख किस तरह मिला सकती है ॥ ४ ॥
दो०—करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
विष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि ॥ ५९ ॥
हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव-जन्तु वनमें विचरते रहते हैं। हे पुत्र! क्या विषकी वाटिकामें सुन्दर सञ्जीवनी बूटी शोभा पा सकती है? ॥ ५९ ॥
बन हित कोल किरात किसोरी । रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी ॥
पाहनकृमि जिमि कठिन सुभाऊ । तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ ॥
वनके लिये तो ब्रह्माजीने विषयसुखको न जाननेवाली कोल और भीलोंकी लड़कियोंको रचा है, जिनका पत्थरके कीड़े-जैसा कठोर स्वभाव है। उन्हें वनमें कभी क्लेश नहीं होता ॥ १ ॥
कै तापस तिय कानन जोगू । जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू ॥
सिय बन बसिहि तात केहि भाँती । चित्रलिखित कपि देखि डेराती ॥
अथवा तपस्वियोंकी स्त्रियाँ वनमें रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्याके लिये सब भोग तज दिये हैं। हे पुत्र! जो तसवीरके बन्दरको देखकर डर जाती हैं वे सीता वनमें किस तरह रह सकेंगी? ॥ २ ॥
सुरसर सुभग बनज बन चारी । डाबर जोगु कि हंसकुमारी ॥
अस बिचारि जस आयसु होई । मैं सिख देउँ जानकिहि सोई ॥