श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 394, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी । अति सुकुमारि देखि अकुलानी ॥ बैठि नमितमुख सोचति सीता । रूप रासि पति प्रेम पुनीता ॥
सासने कोमल वाणीसे आशीर्वाद दिया। वे सीताजीको अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं। रूपकी राशि और पतिके साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नीचा मुख किये बैठी सोच रही हैं ॥ १ ॥
चलन चहत बन जीवननाथू । केहि सुकृती सन होइहि साथू ॥ की तनु प्रान कि केवल प्राना । बिधि करतबु कछु जाइ न जाना ॥
जीवननाथ (प्राणनाथ) वनको चलना चाहते हैं। देखें किस पुण्यवान्से उनका साथ होगा—शरीर और प्राण दोनों साथ जायेंगे या केवल प्राणहीसे इनका साथ होगा? विधाताकी करनी कुछ जानी नहीं जाती ॥ २ ॥
चारु चरन नख लेखति धरनी । नूपुर मुखर मधुर कवि बरनी ॥ मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं । हमहि सीय पद जनि परिहरहीं ॥
सीताजी अपने सुन्दर चरणोंके नखोंसे धरती कुरेद रही हैं। ऐसा करते समय नूपुरोंका जो मधुर शब्द हो रहा है, कवि उसका इस प्रकार वर्णन करते हैं कि मानो प्रेमके वश होकर नूपुर यह बिनती कर रहे हैं कि सीताजीके चरण कभी हमारा त्याग न करें ॥ ३ ॥
मंजु बिलोचन मोचति बारी । बोली देखि राम महतारी ॥ तात सुनहु सिय अति सुकुमारी । सास ससुर परिजनहि पिआरी ॥
सीताजी सुन्दर नेत्रोंसे जल बहा रही हैं। उनकी यह दशा देखकर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी बोलीं—हे तात! सुनो, सीता अत्यन्त ही सुकुमारी हैं तथा सास, ससुर और कुटुम्बी सभीको प्यारी हैं ॥ ४ ॥
दो०—पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु ॥ ५८ ॥
इनके पिता जनकजी राजाओंके शिरोमणि हैं; ससुर सूर्यकुलके सूर्य हैं और पति सूर्यकुलरूपी कुमुदवनको खिलानेवाले चन्द्रमा तथा गुण और रूपके भण्डार हैं ॥ ५८ ॥
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई । रूप रासि गुन सील सुहाई ॥ नयन पुतारि करि प्रीति बढ़ाई । राखेउँ प्रान जानकिहँ लाई ॥
फिर मैंने रूपकी राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रबधू पायी है। मैंने इन (जानकी)को आँखोंकी पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं ॥ १ ॥