श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा । परिहरि सोचु चलहु बन साथा ॥ नहिं बिषाद कर अवसरु आजू । बेगि करहु बन गवन समाजू ॥
तब कृपालु, सूर्यकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ बनको चलो। आज विषाद करनेका अवसर नहीं है। तुरंत वनगमनकी तैयारी करो ॥ २ ॥
कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई । लगे मातु पद आसिष पाई ॥ बेगि प्रजा दुख मेटब आई । जननी निठुर बिसरि जनि जाई ॥
श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर प्रियतमा सीताजीको समझाया। फिर माताके पैरों लगकर आशीर्वाद प्राप्त किया। [माताने कहा—] बेटा! जल्दी लौटकर प्रजाके दुःखको मिटाना और यह निठुर माता तुम्हें भूल न जाय ॥ ३ ॥
फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी । देखिहउँ नयन मनोहर जोरी ॥ सुदिन सुधरी तात कब होइहि । जननी जिअत बदन बिधु जोइहि ॥
हे विधाता! क्या मेरी दशा भी फिर पलटेगी? क्या अपने नेत्रोंसे मैं इस मनोहर जोड़ीको फिर देख पाऊँगी? हे पुत्र! वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते—जी तुम्हारा चाँद—सा मुखड़ा फिर देखेगी ॥ ४ ॥
दो०—बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात । कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात ॥ ६८ ॥
हे तात! 'वत्स' कहकर, 'लाल' कहकर, 'रघुपति' कहकर, 'रघुबर' कहकर, मैं फिर कब तुम्हें बुलाकर हृदयसे लगाऊँगी और हर्षित होकर तुम्हारे अङ्गोंको देखूँगी ॥ ६८ ॥
लखि सनेह कातरि महतारी । बचनु न आव बिकल भइ भारी ॥ राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना । समउ सनेहु न जाइ बखाना ॥
यह देखकर कि माता स्नेहके मारे अधीर हो गयी हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँहसे वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजीने अनेक प्रकारसे उन्हें समझाया। वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ १ ॥
तब जानकी सासु पग लागी । सुनिअ माय मैं परम अभागी ॥ सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा । मोर मनोरथु सफल न कीन्हा ॥
तब जानकीजी सासके पाँव लगीं और बोलीं—हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करनेके समय दैवने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया ॥ २ ॥