श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
४०१
तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू । करमु कठिन कछु दोसु न मोहू ॥ सुनि सिय बचन सासु अकुलानी । दसा कवनि बिधि कहौं बखानी ॥
आप क्षोभका त्याग कर दें, परंतु कृपा न छोड़ियेगा। कर्मकी गति कठिन है, मुझे भी कुछ दोष नहीं है। सीताजीके वचन सुनकर सास व्याकुल हो गयीं। उनकी दशाको मैं किस प्रकार बखानकर कहूँ! ॥ ३ ॥
बारहिं बार लाड़ उर लीन्ही । धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥ अचल होउ अहिवातु तुम्हारा । जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥
उन्होंने सीताजीको बार-बार हृदयसे लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गङ्गाजी और यमुनाजीमें जलकी धारा बहे, तबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे ॥ ४ ॥
दो०—सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।
चली नाड़ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार ॥ ६९ ॥
सीताजीको सासने अनेकों प्रकारसे आशीर्वाद और शिक्षाएँ दीं और वे (सीताजी) बड़े ही प्रेमसे बार-बार चरणकमलोंमें सिर नवाकर चलीं ॥ ६९ ॥
समाचार जब लछिमन पाए । व्याकुल बिलख बदन उठि धाए ॥ कंप पुलक तन नयन सनीरा । गहे चरन अति प्रेम अधीरा ॥
जब लक्ष्मणजीने ये समाचार पाये, तब वे व्याकुल होकर उदास-मुँह उठ दौड़े। शरीर काँप रहा है, रोमाञ्च हो रहा है, नेत्र आँसुओंसे भरे हैं। प्रेमसे अत्यन्त अधीर होकर उन्होंने श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये ॥ १ ॥
कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े । मीनु दीन जुन जल तें काढ़े ॥ सोचु हृदयै बिधि का होनिहारा । सबु सुखु सुकृतु सिरान हमारा ॥
वे कुछ कह नहीं सकते, खड़े-खड़े देख रहे हैं। [ऐसे दीन हो रहे हैं] मानो जलसे निकाले जानेपर मछली दीन हो रही हो। हृदयमें यह सोच है कि हे विधाता! क्या होनेवाला है? क्या हमारा सब सुख और पुण्य पूरा हो गया? ॥ २ ॥
मो कहुँ काह कहब रघुनाथा । रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा ॥ राम बिलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तूनु तोरें ॥
मुझको श्रीरघुनाथजी क्या कहेंगे? घरपर रखेंगे या साथ ले चलेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने भाई लक्ष्मणको हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभीसे नाता तोड़े हुए खड़े देखा ॥ ३ ॥