भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 401
  • अयोध्याकाण्ड *

३११

मोहि मग चलत न होइहि हारी । छिनु छिनु चरन सरोज निहारी ॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं । मारग जनित सकल श्रम हरिहौं ॥

क्षण-क्षणमें आपके चरणकमलोंको देखते रहनेसे मुझे मार्ग चलनेमें थकावट न होगी । हे प्रियतम ! मैं सभी प्रकारसे आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलनेसे होनेवाली सारी थकावटको दूर कर दूँगी ॥ १ ॥

पाय परखारि बैठि तरु छाहीं । करिहुउँ बाउ मुदित मन माहीं ॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें । कहैं दुख समउ प्रानपति पेखें ॥

आपके पैर धोकर, पेड़ोंकी छायामें बैठकर, मनमें प्रसन्न होकर हवा करूँगी (पंखा झलूँगी) । पसीनेकी बूँदोंसहित श्याम शरीरको देखकर—प्राणपतिके दर्शन करते हुए दुःखके लिये मुझे अवकाश ही कहाँ रहेगा ॥ २ ॥

सम महि तून तरुपल्लव डासी । पाय पलोटिहि सब निसि दासी ॥ बार बार मूदु मूरति जोही । लागिहि तात बयारि न मोही ॥

समतल भूमिपर घास और पेड़ोंके पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबावेगी । बार-बार आपकी कोमल मूर्तिको देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी ॥ ३ ॥

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा । सिंधबधुहि जिमि ससक सिआरा ॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहि उचित तप मो कहूँ भोगू ॥

प्रभुके साथ [रहते] मेरी ओर [आँख उठाकर] देखनेवाला कौन है (अर्थात् कोई नहीं देख सकता) ! जैसे सिंहकी स्त्री (सिहनी) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते । मैं सुकुमारी हूँ और नाथ बनके योग्य हैं ? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग ? ॥ ४ ॥

दो०—ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदउ बिलगान । तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावैँ प्रान ॥ ६७ ॥

ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय न फटा तो, हे प्रभु ! [मालूम होता है] ये पामर प्राण आपके वियोगका भीषण दुःख सहेंगे ॥ ६७ ॥

अस कहि सीय बिकल भइ भारी । बचन बियोगु न सकी सँभारी ॥ देखि दसा रघुपति जियँ जाना । हठि राखें नहिं राखिहि प्राना ॥

ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं । वे वचनके वियोगको भी न सँभाल सकीं । (अर्थात् शरीरसे वियोगकी बात तो अलग रही, वचनसे भी वियोगकी बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं) उनकी यह दशा देखकर श्रीरघुनाथजीने अपने जीमें जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहाँ रखनेसे ये प्राणोंको न रखेंगी ॥ १ ॥