भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 392

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  • रामचरितमानस *

सरल सुभाउ राम महतारी । बोली बचन धीर धरि भारी ॥ तात जाऊँ बलि कीन्हेहु नीका । पितु आयसु सब धरमक टीका ॥

सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजीकी माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोली—हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया। पिताकी आज्ञाका पालन करना ही सब धर्मोंका शिरोमणि धर्म है ॥ ४ ॥

दो०—राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु ।

तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु ॥ ५५ ॥

राज्य देनेको कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दुःख नहीं है। [दुःख तो इस बातका है कि] तुम्हारे बिना भरतको, महाराजको और प्रजाको बड़ा भारी क्लेश होगा ॥ ५५ ॥

जौं केवल पितु आयसु ताता । तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ॥

जौं पितु मातु कहेउ बन जाना । तौ कानन सत अवध समाना ॥

हे तात! यदि केवल पिताजीकी ही आज्ञा हो, तो माताको [पितासे] बड़ी जानकर वनको मत जाओ। किन्तु यदि पिता-माता दोनोंने वन जानेको कहा हो, तो वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्याके समान है ॥ १ ॥

पितु बनदेव मातु बनदेवी । खग मृग चरन सरोरुह सेवी ॥

अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू । बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू ॥

वनके देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियों माता होंगी। वहाँके पशु-पक्षी तुम्हारे चरण-कमलोंके सेवक होंगे। राजाके लिये अन्तमें तो वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी [सुकुमार] अवस्था देखकर हृदयमें दुःख होता है ॥ २ ॥

बड़भागी बनु अवध अभागी । जो रघुवंसतिलक तुम्ह त्यागी ॥

जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू । तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू ॥

हे रघुवंशके तिलक! वन बड़ा भाग्यवान् है और यह अवध अभागी है, जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदयमें सन्देह होगा [कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं] ॥ ३ ॥

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के । प्रान प्रान के जीवन जी के ॥

ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ । मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ ॥

हे पुत्र! तुम सभीके परम प्रिय हो। प्राणोंके प्राण और हृदयके जीवन हो। वही (प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता! मैं वनको जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनोंको सुनकर बैठी पछताती हूँ! ॥ ४ ॥

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