श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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धरि धीरजु सुत बदनु निहारी । गदगद बचन कहति महतारी ॥ तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे । देखि मुदित नित चरित तुम्हारे ॥
धीरज धरकर, पुत्रका मुख देखकर माता गदगद वचन कहने लगीं—हे तात! तुम तो पिताको प्राणोंके समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रोंको देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे ॥ ३ ॥
राजु देन कहँ सुभ दिन साधा । कहेउ जान बन केहिँ अपराधा ॥ तात सुनावहु मोहि निदानू । को दिनकर कुल भयउ कृसानू ॥
राज्य देनेके लिये उन्होंने ही शुभ दिन सोधवाया था। फिर अब किस अपराधसे बन जानेको कहा? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ! सूर्यवंश [रूपी वन] को जलानेके लिये अग्नि कौन हो गया? ॥ ४ ॥
दो०—निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ । सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ ॥ ५४ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर मन्त्रीके पुत्रने सब कारण समझाकर कहा। उस प्रसंगको सुनकर वे गूँगी-जैसी (चुप) रह गयीं, उनकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ५४ ॥
राखि न सकइ न कहि सक जाहू । दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू ॥ लिखत सुधाकर गा लिखि राहू । बिधि गति बाम सदा सब काहू ॥
न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही प्रकारसे हृदयमें बड़ा भारी सन्ताप हो रहा है। [मनमें सोचती हैं कि देखो—] विधाताकी चाल सदा सबके लिये टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया राहु! ॥ १ ॥
धरम सनेह उभयँ मति घेरी । भइ गति साँप छुछुंदरि केरी ॥ राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू । धरमु जाइ अरु बंधु विरोधू ॥
धर्म और स्नेह दोनोंने कौसल्याजीकी बुद्धिको घेर लिया। उनकी दशा साँप-छछुंदरकी-सी हो गयी। वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध (हठ) करके पुत्रको रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयोंमें विरोध होता है; ॥ २ ॥
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी । संकट सोच बिबस भइ रानी ॥ बहरि समुझि तिय धरमु सयानी । रामु भरतु दोउ सुत सम जानी ॥
और यदि वन जानेको कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकारके धर्म-संकटमें पड़कर रानी विशेषरूपसे सोचके वश हो गयीं। फिर बुद्धिमती कौसल्याजी स्त्री-धर्म (पातिव्रत-धर्म) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रोंको समान जानकर— ॥ ३ ॥