भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • रामचरितमानस *

हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिताके पास जाना। बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है॥१॥

मातु बचन सुनि अति अनुकूला । जनु सनेह सुरतरु के फूला॥ सुख मकरंद भरे श्रियमूला । निरखि राम मनु भवरु न भूला॥

माताके अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर—जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्षके फूल थे, जो सुखरूपी मकरन्द (पुष्परस) से भरे थे और श्री (राजलक्ष्मी) के मूल थे—ऐसे वचनरूपी फूलोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मनरूपी भौरा उनपर नहीं भूला॥२॥

धरम धुरीन धरम गति जानी । कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥ पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू । जहाँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥

धर्मधुरीण श्रीरामचन्द्रजीने धर्मकी गतिको जानकर मातासे अत्यन्त कोमल वाणीसे कहा—हे माता! पिताजीने मुझको वनका राज्य दिया है, जहाँ सब प्रकारसे मेरा बड़ा काम बननेवाला है॥३॥

आयसु देहि मुदित मन माता । जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥ जनि सनेह बस डरपसि भोरें । आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥

हे माता! तू प्रसन्न मनसे मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रामें आनन्द-मङ्गल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपासे आनन्द ही होगा॥४॥

दो०—बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान ।

आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥५३॥

चौदह वर्ष वनमें रहकर, पिताजीके वचनको प्रमाणित (सत्य) कर, फिर लौटकर तेरे चरणोंका दर्शन करूँगा; तू मनको म्लान (दुःखी) न कर॥५३॥

बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके॥ सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी । जिमि जवास परें पावस पानी॥

रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीके ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माताके हृदयमें बाणके समान लगे और कसकने लगे। उस शीतल वाणीको सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गयीं जैसे बरसातका पानी पड़नेसे जवासा सूख जाता है॥१॥

कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥ नयन सजल तन थर थर काँपी । माजहि खाइ मीन जनु मापी॥

हृदयका विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रोंमें जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। मानो मछली माँजा (पहली वर्षाका फेन) खाकर बदहवास हो गयी हो!॥२॥