भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 389, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 389
  • अयोध्याकाण्ड *

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दो०—नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।

छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान ॥ ५१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका मन नये पकड़े हुए हाथीके समान और राजतिलक उस हाथीके बाँधनेकी काँटेदार लोहेकी बेड़ीके समान है। 'वन जाना है' यह सुनकर, अपनेको बन्धनसे छूटा जानकर, उनके हृदयमें आनन्द बढ़ गया है ॥ ५१ ॥

रघुकुल तिलक जोरि दोउ हाथा । मुदित मातु पद नायउ माथा ॥

दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे । भूषन बसन निछावरि कीन्हे ॥

रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीने दोनों हाथ जोड़कर आनन्दके साथ माताके चरणोंमें सिर नवाया। माताने आशीर्वाद दिया, अपने हृदयसे लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये ॥ १ ॥

बार बार मुख चुंबति माता । नयन नेह जलु पुलकित गाता ॥

गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए । स्वरत प्रेमरस पयद सुहाए ॥

माता बार-बार श्रीरामचन्द्रजीका मुख चूम रही हैं। नेत्रोंमें प्रेमका जल भर आया है और सब अङ्ग पुलकित हो गये हैं। श्रीरामको अपनी गोदमें बैठाकर फिर हृदयसे लगा लिया। सुन्दर स्तन प्रेमरस (दूध) बहाने लगे ॥ २ ॥

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई । रंक धनद पदबी जनु पाई ॥

सादर सुंदर बदनु निहारी । बोली मधुर बचन महतारी ॥

उनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगालने कुबेरका पद पा लिया हो। बड़े आदरके साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं— ॥ ३ ॥

कहहु तात जननी बलिहारी । कबहिं लगन मुद मंगलकारी ॥

सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई । जनम लाभ कइ अवधि अघाई ॥

हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द-मङ्गलकारी लगन कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुखकी सुन्दर सीमा है और जन्म लेनेके लाभकी पूर्णतम अवधि है; ॥ ४ ॥

दो०—जैहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।

जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति ॥ ५२ ॥

तथा जिस (लगन) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यन्त व्याकुलतासे इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्याससे चातक और चातकी शरद-ऋतुके स्वातिनक्षत्रकी वर्षाको चाहते हैं ॥ ५२ ॥

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू । जो मन भाव मधुर कछु खाहू ॥

पितु समीप तब जाएहु भैआ । भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ ॥

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