श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 388, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जिस तरह [नगरभरका] शोक और [तुम्हारा] कलङ्ग मिटे, वही उपाय करके कुलकी रक्षा कर। वन जाते हुए श्रीरामजीको हट करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं—जैसे सूर्यके बिना दिन, प्राणके बिना शरीर और चन्द्रमाके बिना रात [निजीव तथा शोभाहीन हो जाती है], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्या हो जायगी; हे भाभिनी! तू अपने हृदयमें इस बातको समझ (विचारकर देख) तो सही।
सो०—सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।
तेईं कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी ॥ ५० ॥
इस प्रकार सखियोंने ऐसी सीख दी जो सुननेमें मीठी और परिणाममें हितकारी थी। पर कुटिला कूबरीकी सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयीने इसपर जरा भी कान नहीं दिया ॥ ५० ॥
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी । मूगिन्ह चितव जनु बाधिनि भूखी ॥ व्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी । चलीं कहत मतिमंद अभागी ॥
कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोधके मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाधिन हरिनियोंको देख रही हो। तब सखियोंने रोगको असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मन्दबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं ॥ १ ॥
राजु करत यह दैअँ बिगोई । कीन्हेसि अस जस करइ न कोई ॥ एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं । देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं ॥
राज्य करते हुए इस कैकेयीको दैवने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगरके सब स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयीको करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं ॥ २ ॥
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा । कवनि राम बिनु जीवन आसा ॥ बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी । जनु जलचर गन सूखत पानी ॥
लोग विषमज्वर (भयानक दुःखकी आग) से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीनेकी कौन आशा है। महान् वियोग [की आशंका] से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखनेके समय जलचर जीवोंका समुदाय व्याकुल हो! ॥ ३ ॥
अति बिषाद बस लोग लोगाई । गए मातु पहिं रामु गोसाई ॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ । मिटा सोचु जनि राखै राऊ ॥
सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषादके वश हो रहे हैं। स्वामी श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्याके पास गये। उनका मुख प्रसन्न है और चितमें चौगुना चाव (उत्साह) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें। [श्रीरामजीको राजतिलककी बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयोंको छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयीकी आज्ञा और पिताकी मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।] ॥ ४ ॥