भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 387
  • अयोध्याकाण्ड *

३८५

क्या सीताजी अपने पति (श्रीरामचन्द्रजी)-का साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना घर रह सकेंगे? क्या भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यापुरीका राज्य भोग सकेंगे? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीवित रह सकेंगे? (अर्थात् न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा) ॥ ४९ ॥

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू । सोक कलंक कोठि जनि होहू ॥ भरतहि अवसि देहु जुबराजू । कानन काह राम कर काजू ॥

हृदयमें ऐसा विचारकर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलङ्क की कोठी मत बनो। भरतको अवश्य युवराजपद दो, पर श्रीरामचन्द्रजीका वनमें क्या काम है! ॥ १ ॥

नाहिन रामु राज के भूखे । धरम धुरीन बिषय रस रूखे ॥ गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू । नृप सन अस बरु दूसर लेहू ॥

श्रीरामचन्द्रजी राज्यके भूखे नहीं हैं। वे धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले और विषय-रससे रूखे हैं (अर्थात् उनमें विषयासक्ति है ही नहीं)। [इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्रीरामजी वन न गये तो भरतके राज्यमें विघ्न करेंगे; इतनेपर भी मन न माने तो] तुम राजासे दूसरा ऐसा (यह) वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरुके घर रहें ॥ २ ॥

जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे । नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे ॥ जौं परिहास कीन्हि कछु होई । तौ कहि प्रगट जनावहु सोई ॥

जो तुम हमारे कहनेपर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकटमें कहकर जना दो [कि मैंने दिल्लगी की है] ॥ ३ ॥

राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू ॥ उठहु बेगि सोड़ करहु उपाई । जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई ॥

राम-सरीखा पुत्र क्या बनके योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपायसे इस शोक और कलङ्कका नाश हो ॥ ४ ॥

छं०—जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही । हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही ॥ जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जाभिनी । तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भाभिनी ॥