भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 374

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  • रामचरितमानस *

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी । मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी ॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई । भरी क्रोध जल जाइ न जोई ॥

ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोधकी नदी उमड़ी हो। वह नदी पापरूपी पहाड़से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जलसे भरी है; [ऐसी भयानक है कि] देखी नहीं जाती! ॥ १ ॥

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा । भवँर कूबरी बचन प्रचारा ॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला । चली बिपति बारिधि अनुकूला ॥

दोनों वरदान उस नदीके दो किनारे हैं, कैकेयीका कठिन हठ ही उसकी [तीव्र] धारा है और कुबरी (मन्थरा)-के वचनोंकी प्रेरणा ही भँवर है। [वह क्रोधरूपी नदी] राजा दशरथरूपी वृक्षको जड़-मूलसे ढहाती हुई विपत्तिरूपी समुद्रकी ओर [सीधी] चली हैं ॥ २ ॥

लखी नरेस बात फुरि साँची । तिय मिस मीचु सीस पर नाची ॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी । जनि दिनकर कुल होसि कुठारी ॥

राजाने समझ लिया कि बात सचमुच (वास्तवमें) सच्ची है, स्त्रीके बहाने मेरी मृत्यु ही सिरपर नाच रही है। [तदनन्तर राजाने कैकेयीके] चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल-[रूपी वृक्ष] के लिये कुल्हाड़ी मत बन ॥ ३ ॥

मागु माथ अबहीं देउँ तोही । राम बिरहँ जनि मारसि मोही ॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती । नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती ॥

तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर रामके विरहमें मुझे मत मार। जिस किसी प्रकारसे हो तू रामको रख ले। नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी ॥ ४ ॥

दो०—देखी व्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ ।

कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ ॥ ३४ ॥

राजाने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणीसे 'हा राम! हा राम! हा रघुनाथ!' कहते हुए सिर पीटकर जमीनपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥

व्याकुल राउ सिथिल सब गाता । करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता ॥ कंटु सूख मुख आव न बानी । जनु पाठीनु दीन बिनु पानी ॥

राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनीने कल्पवृक्षको उखाड़ फेंका हो। कण्ठ सूख गया, मुखसे बात नहीं निकलती, मानो पानीके बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो ॥ १ ॥