श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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पुनि कह कटु कठोर कैकेई । मनहुँ घाय महँ माहुर देई ॥ जौ अंतहुँ अस करतबु रहेऊ । मागु मागु तुम्ह केहिँ बल कहेऊ ॥
कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घावमें जहर भर रही हो। [कहती है—] जो अन्तमें ऐसा ही करना था, तो आपने 'माँग, माँग' किस बलपर कहा था ॥ २ ॥
दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठठाइ फुलाउब गाला ॥ दानि कहाउब अरु कूपनाई । होइ कि खेम कुसल रौताई ॥
हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना—क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना। क्या रजपूतीमें क्षेम-कुशल भी रह सकती है? (लड़ाईमें बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे!) ॥ ३ ॥
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू । जनि अबला जिमि करुना करहू ॥ तनु तिय तनय धामु धनु धरनी । सत्यसंध कहँ तून सम बरनी ॥
या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये-पीटिये नहीं। सत्यव्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी—सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं ॥ ४ ॥
दो०—मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर । लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर ॥ ३५ ॥
कैकेयीके मर्मभेदी वचन सुनकर राजाने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है। मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है ॥ ३५ ॥
चहत न भरत भूपतहि भोरें । बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें ॥ सो सबु मोर पाप परिनामू । भयउ कुठाहर जेहिँ बिधि बामू ॥
भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जीमें कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापोंका परिणाम है, जिससे कुसमयमें (बेमौके) विधाता विपरीत हो गया ॥ १ ॥
सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई । सब गुन धाम राम प्रभुताई ॥ करिहिं भाइ सकल सेवकाई । होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई ॥
[तेरी उजाड़ी हुई] यह सुन्दर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणोंके धाम श्रीरामकी प्रभुता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकोंमें श्रीरामकी बड़ाई होगी ॥ २ ॥
तोर कलंकु मोर पछिताऊ । मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई । लोचन ओट बैठु मुहु गोई ॥