भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

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  • रामचरितमानस *

केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरनेपर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा। अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर। मुँह छिपाकर मेरी आँखोंकी ओट जा बैठ (अर्थात् मेरे सामनेसे हट जा, मुझे मुँह न दिखा) ॥ ३ ॥

जब लगि जिऔँ कहउँ कर जोरी । तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी ॥ फिरि पछितैहसि अंत अभागी । मारसि गाड़ नहारू लागी ॥

मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जबतक मैं जीता रहूँ, तबतक फिर कुछ न कहना (अर्थात् मुझसे न बोलना)। अरी अभागिनी! फिर तू अन्तमें पछतायेगी जो तू नहारू (ताँत) के लिये गायको मार रही है ॥ ४ ॥

दो०—परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु । कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु ॥ ३६ ॥

राजा करोड़ों प्रकारसे (बहुत तरहसे) समझाकर [और यह कहकर] कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वीपर गिर पड़े। पर कपट करनेमें चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो [मौन होकर] मसान जगा रही हो (शमशानमें बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध कर रही हो) ॥ ३६ ॥

राम राम रट बिकल भुआलू । जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ॥ हृदयँ मनाव भोरु जनि होई । रामहि जाड़ कहै जनि कोई ॥

राजा 'राम-राम' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंखके बिना बेहाल हो। वे अपने हृदयमें मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे यह बात न कहे ॥ १ ॥

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर । अवध बिलोकि सूल होइहि उर ॥ भूप प्रीति कैकड़ कठिनाई । उभय अवधि बिधि रची बनाई ॥

हे रघुकुलके गुरु (बड़ेरे मूलपुरुष) सूर्यभगवान्! आप अपना उदय न करें। अयोध्याको [बेहाल] देखकर आपके हृदयमें बड़ी पीड़ा होगी। राजाकी प्रीति और कैकेयीकी निष्कृता दोनोंको ब्रह्मणे सीमातक रचकर बनाया है (अर्थात् राजा प्रेमकी सीमा हैं और कैकेयी निष्कृताकी) ॥ २ ॥

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा । बीना बेनु संख धुनि द्वारा ॥ पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक । सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक ॥

विलाप करते-करते ही राजाको सबेरा हो गया। राजद्वारपर वीणा, बाँसुरी और शंखकी ध्वनि होने लगी। भाटलोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणोंका गान कर रहे हैं। सुननेपर राजाको वे बाण-जैसे लगते हैं ॥ ३ ॥