भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 377
  • अयोध्याकाण्ड *

३७५

मंगल सकल सोहाहिं न कैसैं। सहगामिनिहि बिभूषन जैसैं॥ तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥

राजाको ये सब मङ्गल-साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पतिके साथ सती होनेवाली स्त्रीको आभूषण! श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकी लालसा और उत्साहेके कारण उस रात्रिमें किसीको भी नींद नहीं आयी ॥ ४ ॥

दो०—द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि ॥ ३७ ॥

राजद्वारपर मन्त्रियों और सेवकोंकी भीड़ लगी है। वे सब सूर्यको उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन-सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभीतक नहीं जागे? ॥ ३७ ॥

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागगा ॥ जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥

राजा नित्य ही रातके पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमन्त्र! जाओ, जाकर राजाको जगाओ। उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें ॥ १ ॥

गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं॥ धाड़ खाड़ जनु जाड़ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥

तब सुमन्त्र रावले (राजमहल)में गये, पर महलको भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं। [ऐसा लगता है] मानो दौड़कर काट खायेगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता। मानो विषादने वहाँ डेरा डाल रखा हो ॥ २ ॥

पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥ कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥

पूछनेपर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महलमें गये, जहाँ राजा और कैकेयी थे। 'जय-जीव' कहकर सिर नवाकर (वन्दना करके) बैठे और राजाकी दशा देखकर तो वे सूख ही गये ॥ ३ ॥

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥ सचिउ सभीत सकड़ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छुँछी॥

[देखा कि—] राजा सोचसे व्याकुल हैं, चेहरेका रंग उड़ गया है। जमीनपर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़से उखड़कर) [मुर्झाया] पड़ा हो। मन्त्री मारे डरके कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभसे भरी हुई और शुभसे विहीन कैकेयी बोली— ॥ ४ ॥