भारतकोश
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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • अयोध्याकाण्ड *

३४९

ध्वजा, पताका, तोरण, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सबको सजाओ। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीके वचनोंको शिरोधार्य करके सब लोग अपने-अपने काममें लग गये ॥ ६ ॥

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा । सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा ॥ बिप्र साधु सुर पूजत राजा । करत राम हित मंगल काजा ॥

मुनीश्वरने जिसको जिस कामके लिये आज्ञा दी, उसने वह काम [इतनी शीघ्रतासे कर डाला कि] मानो पहलेसे ही कर रखा था। राजा ब्राह्मण, साधु और देवताओंको पूज रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजीके लिये सब मङ्गलकार्य कर रहे हैं ॥ १ ॥

सुनत राम अभिषेक सुहावा । बाज गहागह अवध बधावा ॥ राम सीय तन सगुन जनाए । फरकहिं मंगल अंग सुहाए ॥

श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेककी सुहावनी खबर सुनते ही अवधभरमें बड़ी धूमसे बधावे बजने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके शरीरमें भी शुभ शकुन सूचित हुए। उनके सुन्दर मङ्गल अङ्ग फड़कने लगे ॥ २ ॥

पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं । भरत आगमनु सूचक अहहीं ॥ भए बहुत दिन अति अवसेरी । सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी ॥

पुलकित होकर वे दोनों प्रेमसहित एक-दूसरेसे कहते हैं कि ये सब शकुन भरतके आनेकी सूचना देनेवाले हैं। [उनको मामाके घर गये ] बहुत दिन हो गये; बहुत ही अवसेर आ रही है (बार-बार उनसे मिलनेकी मनमें आती है) शकुनोंसे प्रिय (भरत)-के मिलनेका विश्वास होता है ॥ ३ ॥

भरत सरिस प्रिय को जग माहीं । इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं ॥ रामहि बंधु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती ॥

और भरतके समान जगत्में [हमें] कौन प्यारा है! शकुनका बस, यही फल है, दूसरा नहीं। श्रीरामचन्द्रजीको [अपने] भाई भरतका दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुएका हृदय अंडोंमें रहता है ॥ ४ ॥

दो०—एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु । सोभत लखि बिधु बद्धत जनु बारिधि बीचि बिलासु ॥ ७ ॥

इसी समय यह परम मङ्गल समाचार सुनकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। जैसे चन्द्रमाको बढ़ते देखकर समुद्रमें लहरोंका विलास (आनन्द) सुशोभित होता है ॥ ७ ॥

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए । भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए ॥ प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं । मंगल कलस सजन सब लागीं ॥

३५०

  • रामचरितमानस *

सबसे पहले [रनिवासमें] जाकर जिन्होंने ये वचन (समाचार) सुनाये, उन्होंने बहुत-से आभूषण और वस्त्र पाये। रानियोंका शरीर प्रेमसे पुलकित हो उठा और मन प्रेममें मग्न हो गया। वे सब मङ्गलकलश सजाने लगीं ॥ १ ॥

चौकें चारु सुमित्राँ पूरी । मनिमय बिबिध भाँति अति रूरी ॥ आनँद मगन राम महतारी । दिए दान बहु बिप्र हँकारी ॥

सुमित्राजीने मणियों (रत्नों)-के बहुत प्रकारके अत्यन्त सुन्दर और मनोहर चौक पूरे। आनन्दमें मग्न हुई श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने ब्राह्मणोंको बुलाकर बहुत दान दिये ॥ २ ॥

पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा । कहेउ बहोरि देन बलिभागा ॥ जेहि बिधि होइ राम कल्यानू । देहु दया करि सो बरदानू ॥

उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागोंकी पूजा की और फिर बलि भेंट देनेको कहा (अर्थात् कार्य सिद्ध होनेपर फिर पूजा करनेकी मनौती मानी); और प्रार्थना की कि जिस प्रकारसे श्रीरामचन्द्रजीका कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिये ॥ ३ ॥

गावहि मंगल कोकिलबयनीं । बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं ॥

कोयलकी-सी मीठी वाणीवाली, चन्द्रमाके समान मुखवाली और हिरनके बच्चेके-से नेत्रोंवाली स्त्रियाँ मङ्गलगान करने लगीं ॥ ४ ॥

दो०—राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि ॥ ८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका राज्याभिषेक सुनकर सभी स्त्री-पुरुष हृदयमें हर्षित हो उठे और विधाताको अपने अनुकूल समझकर सब सुन्दर मङ्गल-साज सजाने लगे ॥ ८ ॥

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए । रामधाम सिख देन पठाए ॥ गुर आगमनु सुनत रघुनाथा । द्वार आइ पद नायउ माथा ॥

तब राजाने वसिष्ठजीको बुलाया और शिक्षा (समयोचित उपदेश) देनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीके महलमें भेजा। गुरुका आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजीने दरवाजेपर आकर उनके चरणोंमें मस्तक नवाया ॥ १ ॥

सादर अरघ देइ घर आने । सोरह भाँति पूजि सनमाने ॥ गहे चरन सिय सहित बहोरी । बोले रामु कमल कर जोरी ॥

आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घरमें लाये और षोडशोपचारसे पूजा करके उनका सम्मान किया। फिर सीताजीसहित उनके चरण स्पर्श किये और कमलके समान दोनों हाथोंको जोड़कर श्रीरामजी बोले—

  • अयोध्याकाण्ड *

३५१

सेवक सदन स्वामि आगमनू । मंगल मूल अमंगल दमनू॥ तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती । पठइअ काज नाथ असि नीती॥

यद्यपि सेवकके घर स्वामीका पधारना मङ्गलोंका मूल और अमङ्गलोंका नाश करनेवाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दासको ही कार्यके लिये बुला भेजते; ऐसी ही नीति है ॥ ३ ॥

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू । भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥ आयसु होइ सो करौं गोसाईं । सेवकु लहइ स्वामि सेवकाई॥

परन्तु प्रभु (आप)-ने प्रभुता छोड़कर (स्वयं यहाँ पधारकर) जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया। हे गोसाईं! [अब] जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ। स्वामीकी सेवामें ही सेवकका लाभ है ॥ ४ ॥

दो०—मुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस ।

राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस ॥ १ ॥

[श्रीरामचन्द्रजीके] प्रेममें सने हुए वचनोंको सुनकर मुनि वसिष्ठजीने श्रीरघुनाथजीकी प्रशंसा करते हुए कहा कि हे राम! भला, आप ऐसा क्यों न कहें। आप सूर्यवंशके भूषण जो हैं ॥ १ ॥

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ । बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ॥ भूप सजेउ अभिषेक समाजू । चाहत देन तुम्हहि जुबराजू॥

श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका बखान कर, मुनिराज प्रेमसे पुलकित होकर बोले—[हे रामचन्द्रजी!] राजा (दशरथजी)-ने राज्याभिषेककी तैयारी की है। वे आपको युवराज-पद देना चाहते हैं ॥ १ ॥

राम करहु सब संजम आजू । जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥ गुरु सिख देइ राय पहिं गयऊ । राम हृदयै अस बिसमउ भयऊ॥

[इसलिये] हे रामजी! आज आप [उपवास, हवन आदि विधिपूर्वक] सब संयम कीजिये, जिससे विधाता कुशलपूर्वक इस कामको निबाह दें (सफल कर दें)। गुरुजी शिक्षा देकर राजा दशरथजीके पास चले गये। श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें [यह सुनकर] इस बातका खेद हुआ कि— ॥ २ ॥

जनमे एक संग सब भाई । भोजन सयन केलि लरिकाई॥ करनबेध उपबीत बिआहा । संग संग सब भाए उछाहा॥

हम सब भाई एक ही साथ जन्मे; खाना, सोना, लड़कपनके खेल-कूद, कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ-साथ ही हुए ॥ ३ ॥

३५२

  • रामचरितमानस *

बिमल बंस यह अनुचित एकू । बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू ॥ प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई । हरउ भगत मन कै कुटिलाई ॥

पर इस निर्मल वंशमें यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयोंको छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़ेका ही (मेरा ही) होता है। [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका यह सुन्दर प्रेमपूर्ण पछतावा भक्तोंके मनकी कुटिलताको हरण करे ॥ ४ ॥

दो०—तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद । सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद ॥ १० ॥

उसी समय प्रेम और आनन्दमें मग्न लक्ष्मणजी आये। रघुकुलरूपी कुमुदके खिलावेवाले चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया ॥ १० ॥

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना । पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना ॥ भरत आगमनु सकल मनावहिं । आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं ॥

बहुत प्रकारके बाजे बज रहे हैं। नगरके अतिशय आनन्दका वर्णन नहीं हो सकता। सब लोग भरतजीका आगमन मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और [राज्याभिषेकका उत्सव देखकर] नेत्रोंका फल प्राप्त करें ॥ १ ॥

हाट बाट घर गलीं अथाई । कहहिं परसपर लोग लोगाई ॥ कालि लगन भलि केतिक बारा । पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा ॥

बाजार, रास्ते, घर, गली और चबूतरोंपर (जहाँ-तहाँ) पुरुष और स्त्री आपसमें यही कहते हैं कि कल वह शुभ लगन (मुहुर्त) कितने समय है जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे ॥ २ ॥

कनक सिंधासन सीय समेता । बैठहिं रामु होइ चित चेता ॥ सकल कहहिं कब होइहि काली । बिघन मनावहिं देव कुचाली ॥

जब सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजी सुवर्णके सिंहासनपर विराजेंगे और हमारा मनचीता होगा (मनःकामना पूरी होगी)। इधर तो सब यह कह रहे हैं कि कल कब होगा, उधर कुचक्री देवता विघ्न मना रहे हैं ॥ ३ ॥

तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा । चोरहि चंदिनि राति न भावा ॥ सारद बोलि बिनय सुर करहीं । बारहिं बार पाय लै परहीं ॥

उन्हें (देवताओंको) अवधके बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोरको चाँदनी रात नहीं भाती। सरस्वतीजीको बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार-बार उनके पैरोंको पकड़कर उनपर गिरते हैं ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३५३

दो०—बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।

रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु ॥ ११ ॥

[वे कहते हैं—] हे माता! हमारी बड़ी विपत्तिको देखकर आज वही कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी राज्य त्यागकर वनको चले जायें और देवताओंका सब कार्य सिद्ध हो ॥ ११ ॥

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती । भइउँ सरोज बिपिन हिमराती ॥ देखि देव पुनि कहहिं निहोरी । मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी ॥

देवताओंकी विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी-खड़ी पछता रही हैं कि [हाय!] मैं कमलवनके लिये हेमन्त-ऋतुकी रात हुई। उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे— हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा ॥ १ ॥

बिसमय हरष रहित रघुराऊ । तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ ॥ जीव करम बस सुख दुख भागी । जाइअ अवध देवहित लागी ॥

श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्षसे रहित हैं। आप तो श्रीरामजीके सब प्रभावको जानती ही हैं। जीव अपने कर्मवश ही सुख-दुःखका भागी होता है। अतएव देवताओंके हितके लिये आप अयोध्या जाइये ॥ २ ॥

बार बार गहि चरन सँकोची । चली बिचारि बिबुध मति पोची ॥ ऊँच निवासु नीचि करतूती । देखि न सकहिं पराइ बिभूती ॥

बार-बार चरण पकड़कर देवताओंने सरस्वतीको संकोचमें डाल दिया। तब वह यह विचारकर चली कि देवताओंकी बुद्धि ओछी है। इनका निवास तो ऊँचा है, पर इनकी करनी नीची है। ये दूसरेका ऐश्वर्य नहीं देख सकते ॥ ३ ॥

आगिल काजु बिचारि बहोरी । करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी ॥ हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई । जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई ॥

परंतु आगेके कामका विचार करके (श्रीरामजीके वन जानेसे राक्षसोंका वध होगा, जिससे सारा जगत् सुखी हो जायगा) चतुर कवि [श्रीरामजीके वनवासके चरित्रोंका वर्णन करनेके लिये] मेरी चाह (कामना) करेंगे। ऐसा विचारकर सरस्वती हृदयमें हर्षित होकर दशरथजीकी पुरी अयोध्यामें आयीं, मानो दुःसह दुःख देनेवाली कोई ग्रहदशा आयी हो ॥ ४ ॥

दो०—नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकड़ केरि।

अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि ॥ १२ ॥

मन्थरा नामकी कैकेयीकी एक मन्दबुद्धि दासी थी, उसे अपयशकी पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धिको फेरकर चली गयीं ॥ १२ ॥

३५४

  • रामचरितमानस *

दीख मंथरा नगर बनावा । मंजुल मंगल बाज बधावा ॥ पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू । राम तिलकु सुनि भा उर दाहू ॥

मन्थराने देखा कि नगर सजाया हुआ है। सुन्दर मङ्गलमय बधावे बज रहे हैं। उसने लोगोंसे पूछा कि कैसा उत्सव है ? [उनसे] श्रीरामचन्द्रजीके राजतिलककी बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा ॥ १ ॥

करइ विचार कुबुद्धि कुजाती । होइ अकाजु कवनि बिधि राती ॥ देखि लागि मधु कुटिल किराती । जिमि गवँ तकड़ लेउँ केहि भाँती ॥

वह दुर्बुद्धि नीच जातिवाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकारसे यह काम रात-ही-रातमें बिगड़ जाय, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहदका छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरहसे उखाड़ लूँ ॥ २ ॥

भरत मातु पहिं गड़ बिलखानी । का अनमनि हसि कह हँसि रानी ॥ ऊतरु देइ न लेइ उसासू । नारि चरित करि ढारइ आँसू ॥

वह उदास होकर भरतजीकी माता कैकेयीके पास गयी। रानी कैकेयीने हँसकर कहा—तू उदास क्यों है ? मन्थरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी साँस ले रही है और त्रियाचरित्र करके आँसू ढरका रही है ॥ ३ ॥

हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें । दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें ॥ तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि । छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि ॥

रानी हँसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं (तू बहुत बढ़-बढ़कर बोलनेवाली है)। मेरा मन कहता है कि लक्ष्मणने तुझे कुछ सीख दी है (दण्ड दिया है)। तब भी वह महापापिनी दासी कुछ भी नहीं बोलती। ऐसी लंबी साँस छोड़ रही है, मानो काली नागिन [फुफकार छोड़ रही] हो ॥ ४ ॥

दो०— सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु ।

लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु ॥ १३ ॥

तब रानीने डरकर कहा—अरी! कहती क्यों नहीं ? श्रीरामचन्द्र, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कुशलसे तो हैं ? यह सुनकर कुबरी मन्थराके हृदयमें बड़ी ही पीड़ा हुई ॥ १३ ॥

कत सिख देइ हमहि कोउ माई । गालु करब केहि कर बलु पाई ॥ रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू । जेहि जनेसु देइ जुबराजू ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३५५

[वह कहने लगी—] हे माई! हमें कोई क्यों सीख देगा और मैं किसका बल पाकर गाल करूँगी (बढ़-बढ़कर बोलूँगी)। रामचन्द्रको छोड़कर आज और किसकी कुशल है, जिन्हें राजा युवराज-पद दे रहे हैं ॥ १ ॥

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन । देखत गरब रहत उर नाहिन ॥ देखहु कस न जाइ सब सोभा । जो अवलोकि मोर मनु छोभा ॥

आज कौसल्याको विधाता बहुत ही दाहिने (अनुकूल) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदयमें गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मनमें श्लोभ हुआ है ॥ २ ॥

पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें । जानति हहु बस नाहु हमारें ॥ नीद बहुत प्रिय सेज तुराई । लखहु न भूप कपट चतुराई ॥

तुम्हारा पुत्र परदेशमें है, तुम्हें कुछ सोच नहीं। जानती हो कि स्वामी हमारे वशमें है। तुम्हें तो तोशक-पलंगपर पड़े-पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजाकी कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखतीं ॥ ३ ॥

सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी । झुकी रानि अब रहु अरगानी ॥ पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी । तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी ॥

मन्थराके प्रिय वचन सुनकर किन्तु उसको मनकी मैली जानकर रानी झुककर (डॉटकर) बोली—बस, अब चुप रह घरफोड़ी करहींकी! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा लूँगी ॥ ४ ॥

दो०—काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि । तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि ॥ १४ ॥

कानों, लँगड़ों और कुबड़ोंको कुटिल और कुचाली जानना चाहिये। उनमें भी स्त्री और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजीकी माता कैकेयी मुसकरा दीं ॥ १४ ॥

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही । सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही ॥ सुदिनु सुमंगल दायकु सोई । तोर कहा फुर जेहि दिन होई ॥

[और फिर बोलीं—] हे प्रिय वचन कहनेवाली मन्थरा! मैंने तुझको यह सीख दी है (शिक्षाके लिये इतनी बात कही है)। मुझे तुझपर स्वप्नमें भी क्रोध नहीं है। सुन्दर मङ्गलदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा (अर्थात् श्रीरामका राज्यतिलक होगा) ॥ १ ॥

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई । यह दिनकर कुल रीति सुहाई ॥ राम तिलकु जौँ साँचेहुँ काली । देउँ मागु मन भावत आली ॥

३५६

  • रामचरितमानस *

बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है। यह सूर्यवंशकी सुहावनी रीति ही है। यदि सचमुच कल ही श्रीरामका तिलक है, तो हे सखी! तेरे मनको अच्छी लगे वही वस्तु माँग ले, मैं दूँगी ॥ २ ॥

कौसल्या सम सब महतारी । रामहि सहज सुभायँ पिआरी ॥ मो पर करहिं सनेहु बिसेषी । मैं करि प्रीति परीछा देखी ॥

रामको सहज स्वभावसे सब माताएँ कौसल्याके समान ही प्यारी हैं। मुझपर तो वे विशेष प्रेम करते हैं। मैंने उनकी प्रीतिकी परीक्षा करके देख ली है ॥ ३ ॥

जौं बिधि जनमु देड़ करि छोहू । होहुँ राम सिय पूत पुतोहू ॥ प्राण तें अधिक रामु प्रिय मोरें । तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें ॥

जो विधाता कृपा करके जन्म दें तो [यह भी दें कि] श्रीरामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों। श्रीराम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। उनके तिलकसे (उनके तिलककी बात सुनकर) तुझे क्षोभ कैसा? ॥ ४ ॥

दो० — भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ ।

हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ ॥ १५ ॥

तुझे भरतकी सौगन्ध है, छल-कपट छोड़कर सच-सच कह। तू हर्षके समय विषाद कर रही है, मुझे इसका कारण सुना ॥ १५ ॥

एकहिं बार आस सब पूजी । अब कछु कहब जीभ करि दूजी ॥ फोरि जोगु कपारु अभागा । भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा ॥

[मन्थराने कहा—] सारी आशाएँ तो एक ही बार कहनेमें पूरी हो गयीं। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही योग्य है, जो अच्छी बात कहनेपर भी आपको दुःख होता है ॥ १ ॥

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई । ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई ॥ हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती । नाहिं त मौन रहब दिनु राती ॥

जो झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई! वे ही तुम्हें प्रिय हैं और मैं कड़वी लगती हूँ! अब मैं भी ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कहा करूँगी। नहीं तो दिन-रात चुप रहूँगी ॥ २ ॥

करि कुरुप बिधि परबस कीन्हा । बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा ॥ कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३५७

विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [दूसरेको क्या दोष] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ। कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! (अर्थात् रानी तो होनेसे रही) ॥ ३ ॥

जारे जोगु सुभाउ हमारा । अनभल देखि न जाइ तुम्हारा ॥ तातें कछुक बात अनुसारि । छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी ॥

हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो ॥ ४ ॥

दो०—गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।

सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि ॥ १६ ॥

आधाररहित (अस्थिर) बुद्धिकी स्त्री और देवताओंकी मायाके वशमें होनेके कारण रहस्ययुक्त कपटभरे प्रिय वचनोंको सुनकर रानी कैकेयीने बैरिन् मन्थराको अपनी सुहृद (अहैतुक हित करनेवाली) जानकर उसका विश्वास कर लिया ॥ १६ ॥

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही । सबरी गान मूगी जनु मोही ॥ तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी । रहसी चेरि घात जनु फाबी ॥

बार-बार रानी उससे आदरके साथ पूछ रही हैं, मानो भीलनीके गानसे हिरनी मोहित हो गयी हो। जैसी भावी (होनहार) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गयी। दासी अपना दाँव लगा जानकर हर्षित हुई ॥ १ ॥

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ । धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ ॥ सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली । अवध साढ़साती तब बोली ॥

तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूँ। क्योंकि तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोड़ी रख दिया है। बहुत तरहसे गढ़-छोलकर, खूब विश्वास जमाकर, तब वह अयोध्याकी साढ़साती (शनिकी साढ़े सात वर्षकी दशरूपी मन्थरा) बोली— ॥ २ ॥

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी । रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी ॥ रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिं पिरिते ॥

हे रानी! तुमने जो कहा कि मुझे सीता-राम प्रिय हैं और रामको तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है। परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गये। समय फिर जानेपर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं ॥ ३ ॥

भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ सोइ छारा ॥ जरि तुम्हारि चह सवति उखारी । रूँधहु करि उपाउ बर बारी ॥

३५८

  • रामचरितमानस *

सूर्य कमलके कुलका पालन करनेवाला है, पर बिना जलके वही सूर्य उनको (कमलोंको) जलाकर भस्म कर देता है। सौत कौसल्या तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है। अतः उपायरूपी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) लगाकर उसे रूँध दो (सुरक्षित कर दो) ॥ ४ ॥

दो०—तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।

मन मलीन मुह मीठ नृपु राउर सरल सुभाउ ॥ १७ ॥

तुमको अपने सुहागके [झूठे] बलपर कुछ भी सोच नहीं है; राजाको अपने वशमें जानती हो। किन्तु राजा मनके मैले और मुँहके मीठे हैं ! और आपका सीधा स्वभाव है (आप कपट-चतुराई जानती ही नहीं) ॥ १७ ॥

चतुर गँभीर राम महतारी । बीचु पाइ निज बात सँवारी ॥ पठए भरतु भूप ननिअउरें । राम मातु मत जानब रउरें ॥

रामकी माता (कौसल्या) बड़ी चतुर और गम्भीर है (उसकी थाह कोई नहीं पाता)। उसने मौका पाकर अपनी बात बना ली। राजाने जो भरतको ननिहाल भेज दिया, उसमें आप बस रामकी माताकी ही सलाह समझिये ! ॥ १ ॥

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें । गरबित भरत मातु बल पी कें ॥ सालु तुम्हार कौसलिहि माई । कपट चतुर नहिं होइ जनाई ॥

[कौसल्या समझती है कि] और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरतकी माँ पतिके बलपर गर्वित रहती है ! इसीसे हे माई ! कौसल्याको तुम बहुत ही साल (खटक) रही हो। किन्तु वह कपट करनेमें चतुर है; अतः उसके हृदयका भाव जाननेमें नहीं आता (वह उसे चतुरतासे छिपाये रखती है) ॥ २ ॥

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी । सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी ॥ रचि प्रपंचु भूपहि अपनाई । राम तिलक हित लगन धराई ॥

राजाका तुमपर विशेष प्रेम है। कौसल्या सौतके स्वभावसे उसे देख नहीं सकती। इसीलिये उसने जाल रचकर राजाको अपने वशमें करके [भरतकी अनुपस्थितिमें] रामके राजतिलकके लिये लग्न निश्चय करा लिया ॥ ३ ॥

यह कुल उचित राम कहुँ टीका । सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका ॥ आगिलि बात समुझि डरु मोही । देउ दैउ फिरि सो फलु ओही ॥

रामको तिलक हो, यह रघुकुलके उचित ही है और यह बात सभीको सुहाती है; और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है। परन्तु मुझे तो आगेकी बात विचारकर डर लगता है। दैव उलटकर इसका फल उसी (कौसल्या) को दे ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३५९

दो०— रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हैसि कपट प्रबोधु ।

कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु ॥ १८ ॥

इस तरह करोड़ों कुटिलपनकी बातें गढ़-छोलकर मन्थराने कैकेयीको उलटा-सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतोंकी कहानियाँ इस प्रकार [बना-बनाकर] कहीं जिस प्रकार विरोध बढे ॥ १८ ॥

भावी बस प्रतीति उर आई । पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई ॥

का पूँछहु तुम्ह अबहूँ न जाना । निज हित अनहित पसु पहिचाना ॥

होनहारवश कैकेयीके मनमें विश्वास हो गया । रानी फिर सौगन्ध दिलाकर पूछने लगी । [मन्थरा बोली—] क्या पूछती हो ? अरे, तुमने अब भी नहीं समझा ? अपने भले-बुरेको (अथवा मित्र-शत्रुको) तो पशु भी पहचान लेते हैं ॥ १ ॥

भयउ पाखु दिन सजत समाजू । तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू ॥

खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें । सत्य कहें नहिं दोषु हमारें ॥

पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पायी है आज मुझसे ! मैं तुम्हारे राजमें खाती-पहनती हूँ, इसलिये सच कहनेमें मुझे कोई दोष नहीं है ॥ २ ॥

जों असत्य कछु कहब बनाई । तौ बिधि देइहि हमहि सजाई ॥

रामहि तिलक कालि जों भयऊ । तुम्ह कहूँ बिपति बीजु बिधि बयऊ ॥

यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊँगी तो विधाता मुझे दण्ड देगा । यदि कल रामको राजतिलक हो गया तो [समझ रखना कि] तुम्हारे लिये विधाताने विपत्तिका बीज बो दिया ॥ ३ ॥

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी । भामिनि भइहु दूध कइ मारखी ॥

जों सुत सहित करहु सेवकाई । तौ घर रहहु न आन उपाई ॥

मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूँ, हे भामिनी ! तुम तो अब दूधकी मक्खी हो गयीं ! (जैसे दूधमें पड़ी हुई मक्खीको लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घरसे निकाल बाहर करेंगे) जो पुत्रसहित [कौसल्याकी] चाकरी बजाओगी तो घरमें रह सकोगी ; [अन्यथा घरमें रहनेका] दूसरा उपाय नहीं ॥ ४ ॥

दो०— कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब ।

भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब ॥ १९ ॥

कद्रूने विनताको दुःख दिया था, तुम्हें कौसल्या देगी । भरत कारागारका सेवन करेंगे (जेलकी हवा खायेंगे) और लक्ष्मण रामके नायब (सहकारी) होंगे ॥ १९ ॥

३६०

  • रामचरितमानस *

कैकयसुता सुनत कटु बानी । कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी ॥ तन पसेउ कदली जिमि काँपी । कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी ॥

कैकेयी मन्थराकी कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती। शरीरमें पसीना हो आया और वह केलेकी तरह काँपने लगी। तब कुबरी (मन्थरा) ने अपनी जीभ दाँतों-तले दबायी (उसे भय हुआ कि कहीं भविष्यका अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयीके हृदयकी गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय) ॥ १ ॥

कहि कहि कोटिक कपट कहानी । धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी ॥ फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली । बकिहि सराहइ मनि मराली ॥

फिर कपटकी करोड़ों कहानियाँ कह-कहकर उसने रानीको खूब समझाया कि धीरज रखो! कैकेयीका भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी। वह बगुलीको हँसिनी मानकर (वैरिनको हित मानकर) उसकी सराहना करने लगी ॥ २ ॥

सुनु मंथरा बात फुरि तोरी । दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी ॥ दिन प्रति देखउँ राति कुसपने । कहउँ न तोहि मोह बस अपने ॥

कैकेयीने कहा—मन्थरा! सुन, तेरी बात सत्य है। मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़का करती है। मैं प्रतिदिन रातको बुरे स्वप्न देखती हूँ; किन्तु अपने अज्ञानवश तुझसे कहती नहीं ॥ ३ ॥

काह करौं सखि सूध सुभाऊ । दाहिन बाम न जानउँ काऊ ॥

सखी! क्या करूँ, मेरा तो सीधा स्वभाव है। मैं दायाँ-बायाँ कुछ भी नहीं जानती ॥ ४ ॥

दो० — अपने चलत न आजु लागि अनभल काहुक कीन्ह ।

केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह ॥ २० ॥

अपनी चलते (जहाँतक मेरा वश चला) मैंने आजतक कभी किसीका बुरा नहीं किया। फिर न जाने किस पापसे दैवने मुझे एक ही साथ यह दुःसह दुःख दिया ॥ २० ॥

नैहर जनमु भरब बरु जाई । जिअत न करबि सवति सेवकाई ॥ अरि बस दैउ जिआवत जाही । मरनु नीक तेहि जीवन चाही ॥

मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूँगी; पर जीते-जी सौतकी चाकरी नहीं करूँगी। दैव जिसको शत्रुके वशमें रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मरना ही अच्छा है ॥ १ ॥

दीन बचन कह बहुबिधि रानी । सुनि कुबरीं तियमाया ठानी ॥ अस कस कहहु मनि मन ऊना । सुखु सोहागु तुम्ह कहुं दिन दूना ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३६१

रानीने बहुत प्रकारके दिन वचन कहे। उन्हें सुनकर कुबरीने त्रियाचरित्र फैलाया। [वह बोली—] तुम मनमें ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख-सुहाग दिन-दिन दूना होगा ॥ २ ॥

जेहिं राउर अति अनभल ताका । सोड़ पाइहि यहु फलु परिपाका ॥ जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि । भूख न बासर नीद न जामिनि ॥

जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाममें यह (बुराईरूप) फल पायेगी। हे स्वामिनि! मैंने जबसे यह कुमत सुना है, तबसे मुझे न तो दिनमें कुछ भूख लगती है और न रातमें नींद ही आती है ॥ ३ ॥

पूँछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची । भरत भुआल होहिं यह साँची ॥ भामिनि करहु त कहौं उपाऊ । है तुम्हरीं सेवा बस राऊ ॥

मैंने ज्योतिषियोंसे पूछा, तो उन्होंने रेखा खींचकर (गणित करके अथवा निश्चयपूर्वक) कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है। हे भामिनि! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊँ। राजा तुम्हारी सेवाके वशमें हैं ही ॥ ४ ॥

दो०—परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि ।

कहसि मोर दुखु देखि बड़ कसन कर बहित लागि ॥ २१ ॥

[कैकेयीने कहा—] मैं तेरे कहनेसे कुएँमें गिर सकती हूँ, पुत्र और पतिको भी छोड़ सकती हूँ। जब तू मेरा बड़ा भारी दुःख देखकर कुछ कहती है, तो भला मैं अपने हितके लिये उसे क्यों न करूँगी? ॥ २१ ॥

कुबरीं करि कबुली कैकेई । कपट छुरी उर पाहन टेई ॥ लखड़ न रानि निकट दुखु कैसैं । चरइ हरित तिन बलिपसु जैसैं ॥

कुबरीने कैकेयीको [सब तरहसे] कबूल करवाकर (अर्थात् बलिपशु बनाकर) कपटरूप छुरीको अपने [कठोर] हृदयरूपी पत्थरपर टेया (उसकी धारको तेज किया)। रानी कैकेयी अपने निकटके (शीघ्र आनेवाले) दुःखको कैसे नहीं देखती, जैसे बलिका पशु हरी-हरी घास चरता है [पर यह नहीं जानता कि मौत सिरपर नाच रही है] ॥ १ ॥

सुनत बात मृदु अंत कठोरी । देति मनहुं मधु माहुर घोरी ॥ कहड़ चेरि सुधि अहड़ कि नाहीं । स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं ॥

मन्थराकी बातें सुननेमें तो कोमल हैं, पर परिणाममें कठोर (भयानक) हैं। मानो वह शहदमें घोलकर जहर पिला रही हो। दासी कहती है—हे स्वामिनि! तुमने मुझको एक कथा कही थी, उसकी याद है कि नहीं? ॥ २ ॥

३६२

  • रामचरितमानस *

दुइ बरदान भूप सन थाती । मागहु आजु जुड़ावहु छाती ॥ सुतहि राजु रामहि बनबासू । देहु लेहु सब सवति हुलासू ॥

तुम्हारे दो बरदान राजाके पास धरोहर हैं। आज उन्हें राजासे माँगकर अपनी छाती ठंडी करो। पुत्रको राज्य और रामको वनवास दो और सौतका सारा आनन्द तुम ले लो ॥ ३ ॥

भूपति राम सपथ जब करई । तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई ॥ होइ अकाजु आजु निसि बीतें । बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें ॥

जब राजा रामकी सौगंध खा लें, तब वर माँगना, जिससे वचन न टलने पावे। आजकी रात बीत गयी, तो काम बिगड़ जायगा। मेरी बातको हृदयसे प्रिय [या प्राणोंसे भी प्यारी] समझना ॥ ४ ॥

दो०—बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगूहँ जाहु ।

काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु ॥ २२ ॥

पापिनी मन्थराने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा—कोपभवनमें जाओ। सब काम बड़ी सावधानीसे बनाना, राजापर सहसा विश्वास न कर लेना (उनकी बातोंमें न आ जाना) ॥ २२ ॥

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी । बार बार बड़ि बुद्धि बखानी ॥ तोहि सम हित न मोर संसारा । बहे जात कइ भइसि अधारा ॥

कुबरीको रानीने प्राणोंके समान प्रिय समझकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धिका बखान किया और बोली—संसारमें मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है। तू मुझ बही जाती हुईके लिये सहारा हुई है ॥ १ ॥

जौं बिधि पुरब मनोरथु काली । करौं तोहि चख पूतरि आली ॥ बहुबिधि चेरिहि आदरु देई । कोपभवन गवनी कैकेई ॥

यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दें तो हे सखी! मैं तुझे आँखोंकी पुतली बना लूँ। इस प्रकार दासीको बहुत तरहसे आदर देकर कैकेयी कोपभवनमें चली गयी ॥ २ ॥

बिपति बीजु बरषा रिनु चेरी । भुईं भइ कुमति कैकई केरी ॥ पाड़ कपट जलु अंकुर जामा । बर दोउ दल दुख फल परिनामा ॥

विपत्ति (कलह) बीज है, दासी वर्षा-ऋतु है, कैकेयीकी कुबुद्धि [उस बीजके बोनेके लिये] जमीन हो गयी। उसमें कपटरूपी जल पाकर अङ्कुर फूट निकला। दोनों बरदान उस अङ्कुरके दो पत्ते हैं और अन्तमें इसके दुःखरूपी फल होगा ॥ ३ ॥

कोप समाजु साजि सबु सोई । राजु करत निज कुमति बिगोई ॥ राउर नगर कोलाहलु होई । यह कुचालि कछु जान न कोई ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३६३

कैकेयी कोपका सब साज सजकर [कोपभवनमें] जा सोयी। राज्य करती हुई वह अपनी दुष्ट बुद्धिसे नष्ट हो गयी। राजमहल और नगरमें धूम-धाम मच रही है। इस कुचालको कोई कुछ नहीं जानता ॥ ४ ॥

दो०—प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार।

एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार ॥ २३ ॥

बड़े ही आनन्दित होकर नगरके सब स्त्री-पुरुष शुभ मङ्गलाचारके साज सज रहे हैं। कोई भीतर जाता है, कोई बाहर निकलता है; राजद्वारमें बड़ी भीड़ हो रही है ॥ २३ ॥

बाल सरखा सुनि हियँ हरषाहीं । मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं ॥ प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी । पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी ॥

श्रीरामचन्द्रजीके बालसरखा राजतिलकका समाचार सुनकर हृदयमें हर्षित होते हैं। वे दस-पाँच मिलकर श्रीरामचन्द्रजीके पास जाते हैं। प्रेम पहचानकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी उनका आदर करते हैं और कोमल वाणीसे कुशल-क्षेम पूछते हैं ॥ १ ॥

फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई । करत परसपर राम बड़ाई ॥ को रघुबीर सरिस संसारा । सीलु सनेहु निबाहनहारा ॥

अपने प्रिय सखा श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर वे आपसमें एक-दूसरेसे श्रीरामचन्द्रजीकी बड़ाई करते हुए घर लौटते हैं और कहते हैं—संसारमें श्रीरघुनाथजीके समान शील और स्नेहको निबाहनेवाला कौन है ? ॥ २ ॥

जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं । तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं ॥ सेवक हम स्वामी सियनाहू । होउ नात यह ओर निबाहू ॥

भगवान् हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश भ्रमते हुए जिस-जिस योनिमें जन्में, वहाँ-वहाँ (उस-उस योनिमें) हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्रजी हमारे स्वामी हों और यह नाता अन्ततक निभ जाय ॥ ३ ॥

अस अभिलाषु नगर सब काहू । कैकयसुता हृदयँ अति दाहू ॥ को न कुसंगति पाइ नसाई । रहइ न नीच मतें चतुराई ॥

नगरमें सबकी ऐसी ही अभिलाषा है। परन्तु कैकेयीके हृदयमें बड़ी जलन हो रही है। कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता। नीचके मतके अनुसार चलनेसे चतुराई नहीं रह जाती ॥ ४ ॥

दो०—साँझ समय सानंद नृपु गयउ कैकई गेहँ।

गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ ॥ २४ ॥

३६४

  • रामचरितमानस *

सन्ध्याके समय राजा दशरथ आनन्दके साथ कैकेयीके महलमें गये। मानो साक्षात् स्नेह ही शरीर धारण कर निष्ठुरताके पास गया हो!॥ २४॥

कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ । भय बस अगहुड़ परड़ न पाऊ॥ सुरपति बसइ बाहँबल जाकें । नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥

कोपभवनका नाम सुनकर राजा सहम गये। डरके मारे उनका पाँव आगेको नहीं पड़ता। स्वयं देवराज इन्द्र जिनकी भुजाओंके बलपर [राक्षसोंसे निर्भय होकर] बसता है और सम्पूर्ण राजालोग जिनका रुख देखते रहते हैं, ॥ १ ॥

सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई । देखहु काम प्रताप बड़ाई॥ सूल कुलिस असि अँगवनिहारे । ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥

वही राजा दशरथ स्त्रीका क्रोध सुनकर सूख गये। कामदेवका प्रताप और महिमा तो देखिये। जो त्रिशूल, वज्र और तलवार आदिकी चोट अपने अङ्गोंपर सहनेवाले हैं, वे रतिनाथ कामदेवके पुष्पबाणसे मारे गये ॥ २ ॥

सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ । देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥ भूमि सयन पटु मोट पुराना । दिए डारि तन भूषन नाना॥

राजा डरते-डरते अपनी प्यारी कैकेयीके पास गये। उसकी दशा देखकर उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ। कैकेयी जमीनपर पड़ी है। पुराना मोटा कपड़ा पहने हुए है। शरीरके नाना आभूषणोंको उतारकर फेंक दिया है ॥ ३ ॥

कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी । अनअहिवातु सूच जनु भाबी॥ जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी । प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥

उस दुर्बुद्धि कैकेयीको यह कुबेषता (बुरा वेष) कैसी फब रही है, मानो भावी विधवापनकी सूचना दे रही हो। राजा उसके पास जाकर कोमल वाणीसे बोले—हे प्राणप्रिये! किसलिये रिसाई (रूठी) हो? ॥ ४ ॥

छं०—केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥ दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतव्यता बस काम कौतुक लेखई॥

‘हे रानी! किसलिये रूठी हो?’ यह कहकर राजा उसे हाथसे स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथको [झटककर] हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोधमें भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टिसे देख रही हो। दोनों [वरदानोंकी] वासनाएँ उस नागिनकी दो जीभें हैं और दोनों वरदान दाँत हैं; वह काटनेके लिये मर्मस्थान देख रही है। तुलसीदासजी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहारके वशमें होकर इसे (इस प्रकार हाथ झटकने और नागिनकी भाँति देखनेको) कामदेवकी क्रीड़ा ही समझ रहे हैं।

  • अयोध्याकाण्ड *

३६५

सो० — बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि ।

कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर ॥ २५ ॥

राजा बार-बार कह रहे हैं—हे सुमुखी! हे सुलोचनी! हे कोकिलबयनी! हे गजगामिनी! मुझे अपने क्रोधका कारण तो सुना ॥ २५ ॥

अनहित तोर प्रिया केईं कीन्हा । केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा ॥ कहु केहि रंकहि करौं नरेसू । कहु केहि नृपहि निकासौं देसू ॥

हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं? यमराज किसको लेना (अपने लोकको ले जाना) चाहते हैं ? कह, किस कंगालको राजा कर दूँ या किस राजाको देशसे निकाल दूँ ॥ १ ॥

सकउँ तोर अरि अमरउ मारी । काह कीट बपुरे नर नारी ॥ जानसि मोर सुभाउ बरोरू । मनु तव आनन चंद चकोरू ॥

तेरा शत्रु अमर (देवता) भी हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूँ। बेचारे कीड़े-मकोड़े-सरीखे नर-नारी तो चीज ही क्या हैं। हे सुन्दरि! तू तो मेरा स्वभाव जानती ही है कि मेरा मन सदा तेरे मुखरूपी चन्द्रमाका चकोर है ॥ २ ॥

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें । परिजन प्रजा सकल बस तोरें ॥ जौं कछु कहौं कपटु करि तोही । भामिनि राम सपथ सत मोही ॥

हे प्रिये! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व (सम्पत्ति), पुत्र, यहाँतक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वशमें (अधीन) हैं। यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊँ तो हे भामिनी! मुझे सौ बार रामकी सौगंध है ॥ ३ ॥

बिहसि मागु मनभावति बाता । भूषन सजहि मनोहर गाता ॥ घरी कुघरी समुझि जियँ देखू । बेगि प्रिया परिहरहि कुबेष् ॥

तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगोंको आभूषणोंसे सजा। मौका-बेमौका तो मनमें विचारकर देख। हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेषको त्याग दे ॥ ४ ॥

दो० — यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद ।

भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद ॥ २६ ॥

यह सुनकर और मनमें रामजीकी बड़ी सौगन्धको विचारकर मन्दबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृगको देखकर फंद तैयार कर रही हो! ॥ २६ ॥

३६६

  • रामचरितमानस *

पुनि कह राउ सुहद जियँ जानी । प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी ॥ भामिनि भयउ तोर मनभावा । घर घर नगर अनंद बधावा ॥

अपने जीमें कैकेयीको सुहद जानकर राजा दशरथजी प्रेमसे पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणीसे फिर बोले—हे भामिनि! तेरा मनचीता हो गया। नगरमें घर-घर आनन्दके बधावे बज रहे हैं ॥ १ ॥

रामहि देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचनि मंगल साजू ॥ दलकि उठेउ सुनि हदउ कठोरु । जनु छुइ गयउ पाक बरतोरु ॥

मैं कल ही रामको युवराज-पद दे रहा हूँ। इसलिये हे सुनयनी! तू मङ्गल-साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो ॥ २ ॥

ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई । चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई ॥ लखहिं न भूप कपट चतुराई । कोटि कुटिल मनि गुरु पढ़ाई ॥

ऐसी भारी पीड़ाको भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोरकी स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें उसका भेद न खुल जाय)। राजा उसकी कपट-चतुराईको नहीं लख रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलोंकी शिरोमणि गुरु मन्थराकी पढ़ायी हुई है ॥ ३ ॥

जद्यपि नीति निपुन नरनाहू । नारिचरित जलनिधि अवगाहू ॥ कपट सनेहु बढाइ बहोरी । बोली बिहसि नयन मुहु मोरी ॥

जद्यपि राजा नीतिमें निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर (ऊपरसे प्रेम दिखाकर) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली— ॥ ४ ॥

दो०—मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु ॥ २७ ॥

हे प्रियतम! आप माँग-माँग तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो बरदान देनेको कहा था, उनके भी मिलनेमें सन्देह है ॥ २७ ॥

जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई । तुम्हि कोहाब परम प्रिय अहई ॥ थाती राखि न मागिहु काऊ । बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ ॥

राजाने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म (मतलब) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरोंको थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलनेका स्वभाव होनेसे मुझे भी वह प्रसङ्ग याद नहीं रहा ॥ १ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

३६७

झूठेहूँ हमहि दोषु जनि देहू । दुइ कै चारि मागि मकु लेहू ॥ रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्रान जाहूँ बरु बचनु न जाई ॥

मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो । चाहे दोके बदले चार माँग लो । रघुकुलमें सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायँ, पर वचन नहीं जाता ॥ २ ॥

नहि असत्य सम पातक पुंजा । गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा ॥ सत्यमूल सब सुकृत सुहाए । बेद पुरान बिदित मनु गाए ॥

असत्यके समान पापोंका समूह भी नहीं है । क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़के समान हो सकती हैं । 'सत्य' ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों)-की जड़ है । यह बात वेद-पुराणोंमें प्रसिद्ध है और मनुजीने भी यही कहा है ॥ ३ ॥

तेहि पर राम सपथ करि आई । सुकृत सनेह अवधि रघुराई ॥ बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली । कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली ॥

उसपर मेरे द्वारा श्रीरामजीकी शपथ करनेमें आ गयी (मुँहसे निकल पड़ी) । श्रीरघुनाथजी मेरे सुकृत (पुण्य) और स्नेहकी सीमा हैं । इस प्रकार बात पक्की करके दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो उसने कुमत (बुरे विचार) रूपी दुष्ट पक्षी (बाज)-[को छोड़नेके लिये उस]-की कुलही (आँखोंपरकी टोपी) खोल दी ॥ ४ ॥

दो०—भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु । भिल्लिन जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु ॥ २८ ॥

राजाका मनोरथ सुन्दर वन है, सुख सुन्दर पक्षियोंका समुदाय है । उसपर भीलनीकी तरह कैकेयी अपना वचनरूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है ॥ २८ ॥

मासपारायण, तेरहवाँ विश्राम

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का । देहु एक बर भरतहि टीका ॥ मागउँ दूसर बर कर जोरी । पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी ॥

[वह बोली—] हे प्राणप्यारे ! सुनिये, मेरे मनको भानेवाला एक वर तो दीजिये, भरतको राजतिलक; और हे नाथ ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये— ॥ १ ॥

तापस बेष बिसेषि उदासी । चौदह बरिस रामु बनबासी ॥ सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू । ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू ॥

३६८

  • रामचरितमानस *

तपस्वियोंके वेषमें विशेष उदासीन भावसे (राज्य और कुटुम्ब आदिकी ओरसे भलीभाँति उदासीन होकर विरक्त मुनियोंकी भाँति) राम चौदह वर्षतक वनमें निवास करें। कैकेयीके कोमल (विनययुक्त) वचन सुनकर राजाके हृदयमें ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके स्पर्शसे चकवा विकल हो जाता है ॥ २ ॥

गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा । जनु सचान बन झपटेउ लावा ॥ बिबरन भयउ निपट नरपालू । दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू ॥

राजा सहम गये, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज वनमें बटेरपर झपटा हो। राजाका रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़के पेड़को बिजलीने मारा हो (जैसे ताड़के पेड़पर बिजली गिरनेसे वह झूलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजाका हुआ) ॥ ३ ॥

माथें हाथ मूदि दोउ लोचन । तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन ॥ मोर मनोरथु सुरतरु फूला । फरत करिनि जिमि हतेउ समूला ॥

माथेपर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात् सोच ही शरीर धारणकर सोच कर रहा हो। [वे सोचते हैं—हाय!] मेरा मनोरथरूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयीने हथिनीकी तरह उसे जड़समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला ॥ ४ ॥

अवध उजारि कीन्हि कैकेई । दीन्हिसि अचल बिपति कै नेई ॥

कैकेयीने अयोध्याको उजाड़ कर दिया और विपत्तिकी अचल (सुदृढ़) नींव डाल दी ॥ ५ ॥

दो०—कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास ।

जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्या नास ॥ २९ ॥

किस अवसरपर क्या हो गया! स्त्रीका विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योगकी सिद्धिरूपी फल मिलनेके समय योगीको अविद्या नष्ट कर देती है ॥ २९ ॥

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा । देखि कुभाँति कुमति मन माखा ॥

भरतु कि राउर पूत न होंही । आनेहु मोल बेसाहि कि मोही ॥

इस प्रकार राजा मन-ही-मन झाँख रहे हैं। राजाका ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मनमें बुरी तरहसे क्रोधित हुई। [और बोली—] क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं ? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाये हैं ? (क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ?) ॥ ११ ॥

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें । काहे न बोलहु बचनु सँभारें ॥

देहु उत्तरु अनु करहु कि नाही । सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं ॥