श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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हे माता! मुझे एक ही दुःख विशेषरूपसे हो रहा है, वह महाराजको अत्यन्त व्याकुल देखकर। इस थोड़ी-सी बातके लिये ही पिताजीको इतना भारी दुःख हो, हे माता! मुझे इस बातपर विश्वास नहीं होता ॥ ३ ॥
राउ धीर गुन उदधि अगाधू । भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू ॥ जातें मोहि न कहत कछु राऊ । मोरि सपथ तोहि कहु सति भाऊ ॥
क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणोंके अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगन्ध है, माता! तुम सच-सच कहो ॥ ४ ॥
दो०—सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान ।
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान ॥ ४२ ॥
रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावसे ही सीधे वचनोंको दुर्बुद्धि कैकेयी टेढ़ा ही करके जान रही है; जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें टेढ़ी चालसे ही चलती है ॥ ४२ ॥
रहसी रानि राम रुख पाई । बोली कपट सनेहु जनाई ॥ सपथ तुम्हार भरत कै आना । हेतु न दूसर मैं कछु जाना ॥
रानी कैकेयी श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर हर्षित हो गयी और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली—तुम्हारी शपथ और भरतकी सौगन्ध है, मुझे राजाके दुःखका दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है ॥ १ ॥
तुम्ह अपराध जोगु नहीं ताता । जननी जनक बंधु सुखदाता ॥ राम सत्य सबु जो कछु कहहू । तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ॥
हे तात! तुम अपराधके योग्य नहीं हो (तुमसे माता-पिताका अपराध बन पड़े, यह सम्भव नहीं)। तुम तो माता-पिता और भाइयोंको सुख देनेवाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता-माताके वचनों [के पालन] में तत्पर हो ॥ २ ॥
पितहि बुझाइ कहहू बलि सोई । चौथेंपन जेहिं अजसु न होई ॥ तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे । उचित न तासु निरादरु कीन्हे ॥
मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिताको समझाकर वही बात कहो जिससे चौथेपन (बुढ़ापे) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्यने इनको तुम-जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं ॥ ३ ॥
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे । मगहैं गयादिक तीरथ जैसे ॥ रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ॥