भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

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  • रामचरितमानस *

कैकेयीके बुरे मुखमें ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देशमें गया आदिक तीर्थ! श्रीरामचन्द्रजीको माता कैकेयीके सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गङ्गाजीमें जाकर [अच्छे-बुरे सभी प्रकारके] जल शुभ, सुन्दर हो जाते हैं ॥ ४ ॥

दो०—गड़ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह ।

सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह ॥ ४३ ॥

इतनेमें राजाकी मूर्च्छा दूर हुई, उन्होंने रामका स्मरण करके ('राम-राम!' कहकर) फिरकर करवट ली। मन्त्रीने श्रीरामचन्द्रजीका आना कहकर समयानुकूल विनती की ॥ ४३ ॥

अवनिप अकनि रामु पगु धारे । धरि धीरजु तब नयन उघारे ॥ सचिवँ सँभारि राउ बैठारे । चरन परत नृप रामु निहारे ॥

जब राजाने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मन्त्रीने सँभालकर राजाको बैठाया। राजाने श्रीरामचन्द्रजीको अपने चरणोंमें पड़ते (प्रणाम करते) देखा ॥ १ ॥

लिए सनेह बिकल उर लाई । गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई ॥ रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । चला बिलोचन बारि प्रबाहू ॥

स्नेहसे विकल राजाने रामजीको हृदयसे लगा लिया। मानो साँपने अपनी खोयी हुई मणि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी श्रीरामजीको देखते ही रह गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली ॥ २ ॥

सोक बिबस कछु कहै न पारा । हृदयँ लगावत बारहि बारा ॥ बिधिहि मनाव राउ मन माहीं । जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं ॥

शोकके विशेष वश होनेके कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगाते हैं और मनमें ब्रह्माजीको मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी बनको न जार्यें ॥ ३ ॥

सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी । बिनती सुनहु सदासिव मोरी ॥ आसुतोष तुम्ह अवढर दानी । आरति हरहु दीन जनु जानी ॥

फिर महादेवजीका स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं—हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होनेवाले) और अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालनेवाले) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःखको दूर कीजिये ॥ ४ ॥

दो०—तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु ।

बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु ॥ ४४ ॥

आप प्रेरकरूपसे सबके हृदयमें हैं। आप श्रीरामचन्द्रको ऐसी बुद्धि दीजिये जिससे वे मेरे वचनको त्यागकर और शील-स्नेहको छोड़कर घरहीमें रह जायें ॥ ४४ ॥