श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जनु कठोरपनु धरें सरीरू । सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू ॥ सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई । बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई ॥
[इस सारे साज-सामानके साथ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीरका शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है। श्रीरघुनाथजीको सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो ॥ २ ॥
मन मुसुकाइ भानुकुल भानू । रामु सहज आनंद निधानू ॥ बोले बचन बिगत सब दूषन । मूदु मंजुल जनु बाग बिभूषन ॥
सूर्यकुलके सूर्य, स्वाभाविक ही आनन्दनिधान श्रीरामचन्द्रजी मनमें मुसकराकर सब दूषणोंसे रहित ऐसे कोमल और सुन्दर बचन बोले जो मानो वाणीके भूषण ही थे— ॥ ३ ॥
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी । जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥ तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥
हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माताके बचनोंका अनुरागी (पालन करनेवाला) है। [आज्ञा-पालनके द्वारा] माता-पिताको सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी! सारे संसारमें दुर्लभ है ॥ ४ ॥
दो०—मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर । तेहि महाँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर ॥ ४१ ॥
वनमें विशेषरूपसे मुनियोंका मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकारसे कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजीकी आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है ॥ ४१ ॥
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू । बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू ॥ जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा । प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा ॥
और प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे। [इन सभी बातोंको देखकर यह प्रतीत होता है कि] आज विधाता सब प्रकारसे मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं)। यदि ऐसे कामके लिये भी मैं वनको न जाऊँ तो मूर्खोंके समाजमें सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये ॥ १ ॥
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी । परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी ॥ तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं । देखु बिचारि मातु मन माहीं ॥
जो कल्पवृक्षको छोड़कर रेंड़की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मनमें विचारकर देखो, वे (महामूर्ख)भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे ॥ २ ॥
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी । निपट बिकल नरनायकु देखी ॥ थोरिहि बात पितहि दुख भारी । होति प्रतीति न मोहि महतारी ॥