भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 405
  • अयोध्याकाण्ड *

४०३

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं । लागि अगम अपनी कदराई ॥ नरबर धीर धरम धुर धारी । निगम नीति कहूं ते अधिकारी ॥

हे स्वामी! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरतासे वह मेरे लिये अगम (पहुँचके बाहर) लगी। शास्त्र और नीतिके तो वे ही श्रेष्ठ पुरुष अधिकारी हैं जो धीर हैं और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हैं ॥ १ ॥

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला । मंदरु मेरु कि लेहँ मराला ॥ गुर पितु मातु न जानउँ काहू । कहहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू ॥

मैं तो प्रभु (आप) के स्नेहमें पला हुआ छोटा बच्चा हूँ! कहीं हंस भी मन्दराचल या सुमेरु पर्वतको उठा सकते हैं! हे नाथ! स्वभावसे ही कहता हूँ, आप विश्वास करें, मैं आपको छोड़कर गुरु, पिता, माता किसीको भी नहीं जानता ॥ २ ॥

जहँ लगि जगत सनेह सगाईं । प्रीति प्रतीति निगम निजु गाईं ॥ मोरें सबड़ एक तुम्ह स्वामी । दीनबंधु उर अंतरजामी ॥

जगत्में जहाँतक स्नेहका सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेदने गाया है—हे स्वामी! हे दीनबन्धु! हे सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं ॥ ३ ॥

धरम नीति उपदेसिअ ताही । कीरति भूति सुगति प्रिय जाही ॥ मन क्रम बचन चरन रत होई । कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई ॥

धर्म और नीतिका उपदेश तो उसको करना चाहिये जिसे कीर्ति, विभूति (ऐश्वर्य) या सद्गति प्यारी हो। किन्तु जो मन, वचन और कर्मसे चरणोंमें ही प्रेम रखता हो, हे कृपासिन्धु! क्या वह भी त्यागनेके योग्य है? ॥ ४ ॥

दो०—करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत । समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत ॥ ७२ ॥

दयाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने भले भाईके कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेहके कारण डरे हुए जानकर, हृदयसे लगाकर समझाया ॥ ७२ ॥

मागहु बिदा मातु सन जाईं । आवहु बेगि चलहु बन भाईं ॥ मुदित भए सुनि रघुबर बानी । भयउ लाभ बड़ गड़ बड़ि हानी ॥

[और कहा—] हे भाई! जाकर मातासे विदा माँग आओ और जल्दी बनको चलो! रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीकी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आनन्दित हो गये। बड़ी हानि दूर हो गयी और बड़ा लाभ हुआ! ॥ १ ॥