भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

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  • रामचरितमानस *

हरषित हृदयं मातु पहिं आए । मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए ॥ जाइ जननि पग नायउ माथा । मनु रघुनंदन जानकि साथा ॥

वे हर्षित हृदयसे माता सुमित्राजीके पास आये, मानो अंधा फिरसे नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माताके चरणोंमें मस्तक नवाया। किन्तु उनका मन रघुकुलको आनन्द देनेवाले श्रीरामजी और जानकीजीके साथ था ॥ २ ॥

पूँछे मातु मलिन मन देखी । लखन कही सब कथा बिसेषी ॥ गई सहमि सुनि बचन कठोरा । मूगी देखि दव जनु चहु ओरा ॥

माताने उदास मन देखकर उनसे [कारण] पूछा। लक्ष्मणजीने सब कथा विस्तारसे कह सुनायी। सुमित्राजी कठोर वचनोंको सुनकर ऐसी सहम गयीं जैसे हिरनी चारों ओर वनमें आग लगी देखकर सहम जाती हैं ॥ ३ ॥

लखन लखेउ भा अनरथ आजू । एहिं सनेह बस करब अकाजू ॥ मागत बिदा सभय सकुचाहीं । जाइ संग बिधि कहिहि कि नाहीं ॥

लक्ष्मणने देखा कि आज (अब) अनर्थ हुआ। ये स्नेहवश काम बिगाड़ देंगी! इसलिये वे विदा माँगते हुए डरके मारे सकुचाते हैं [और मन-ही-मन सोचते हैं] कि हे विधाता! माता साथ जानेको कहेंगी या नहीं ॥ ४ ॥

दो०—समुद्धि सुमित्राँ राम सिय रूपु सुसीलु सुभाउ ।

नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ ॥ ७३ ॥

सुमित्राजीने श्रीरामजी और श्रीसीताजीके रूप, सुन्दर शील और स्वभावको समझकर और उनपर राजाका प्रेम देखकर अपना सिर धुना (पीटा) और कहा कि पापिनी कैकेयीने बुरी तरह घात लगाया ॥ ७३ ॥

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी । सहज सुहद बोली मृदु बानी ॥ तात तुम्हारि मातु बैदेही । पिता रामु सब भाँति सनेही ॥

परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभावसे ही हित चाहनेवाली सुमित्राजी कोमल वाणीसे बोली—हे तात! जानकीजी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकारसे स्नेह करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं! ॥ १ ॥

अवध तहाँ जहाँ राम निवासू । तहाँई दिवसु जहाँ भानु प्रकासू ॥ जौं पै सीय रामु बन जाहीं । अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं ॥

जहाँ श्रीरामजीका निवास हो वहीं अयोध्या है। जहाँ सूर्यका प्रकाश हो वहीं दिन है। यदि निश्चय ही सीता-राम वनको जाते हैं तो अयोध्यामें तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है ॥ २ ॥